Monday, December 1, 2025

नौकरी


परदेश में नौकरी का, तिरा आलम ये हो गया,

घर था जो मेरे लिए हमेशा, अब मकाँ हो गया,

गूंजता था जहां नाम मेरा, कभी बेतरीबी से,

आज वहीं तहजीब की, जंजीरों में कैद हो गया ।


आफिस में तो थी ही, पदवी साहब के नाम की,

अपनो में भी अब, इसी नाम से बदनाम हो गया।

गले में डाल बाहें, कभी घूमता था साथ जिनके,

उन्ही यारों से मिलना भी, अब दुश्वार हो गया ।


मुझे तो मिल गए के अपने, इस अंजान शहर में,

मगर बच्चों से दादा दादी का वो प्यार रह गया,

छीनी है बीवी से भी ननद ओ भावज की चुहलबाज़ी,

हुआ था जो एक, देवरानी जेठानी का करार रह गया ।


निकला था देने खुशियाँ, अपनो को हर जहां की,

पर अपनी ही गफलतों का, होकर मैं शिकार रह गया,

लगती है ये नौकरी अब, उस जालिम साहूकार जैसी

जिसके कर्ज़ का मैं बनकर, बंधुआ कर्ज़दार रह गया ,

जिसके कर्ज़ का मैं बनकर, बंधुआ कर्ज़दार रह गया ।


'अक्स'


Monday, September 23, 2024

अज्ञान

जब अज्ञान मनुष्य पर छाता है

तब सब शून्य हो जाता है

करता है बस क्षितिज की बातें, 

पर न थाह ज़मीन की पाता है'


अम्बर में डोलता है तन मन,

नित हवा में उड़ता जाता है,

मुट्ठी में करना बंद रेत को,

एक खेल समझ वो पाता है


जब अज्ञान मनुष्य पर छाता है,

तब सब शून्य हो जाता है,


 घिरता है संशय के अंधड़ में,

और गहरा फँसता जाता है 

जाता है भटक वो मंजिल से,

रास्ता भी धुंधला जाता है,


अपनों का साथ करे विचलित,

बस अकेलापन उसे भाता है,

घुटता रहता है बस मन में,

बाहर ना गुबार ला पाता है ,


जब अज्ञान मनुष्य पर छाता है,

तब सब शून्य हो जाता है,


'अक्स'


Sunday, June 18, 2023

प्रकृति का रोष

"जब जब धरती थर्राती है,

ये नए जलजले लाती है,

कहीं करे बौछार ये लावा की,

कहीं जलप्रलय बरसाती है"


"जब लावा दहक निकलता है,

बस सबकुछ फूंक ये चलता है,

हर ओर उठे बस धुआं गुबार,

ना किसी के थामे थमता है" 


"ये जलप्रलय जब आती है,

सब कुछ बहा ले जाती है,

जल ही जल विचरण करता है,

जिस ओर नज़र ये जाती है"


"प्रकृति का अपना है नियम,

बिन भूल उसे अपनाती है,

सृजन और सर्वनाश की शक्ति का,

मंजर सबको दिखलाती है "


'अक्स'

Wednesday, June 7, 2023

इश्क़ की कचहरी

"लगा के इश्क़ की कचहरी, ये दफा दर्ज की जाए,

निगाहें शौक के कातिलों को भी सजा दी जाए,

लगाई जाए ताला बंदी इनकी हंसीं निगाहों पर, 

सुर्ख लबों की तबस्सुम भी नजरबंद की जाए"


"करते हैं दावा इश्क का ये, उन्माद ए हुश्न में,

राह ए मोहब्बत पर कोई दरबान बिठाया जाए,

निगाहें शौक से मरने वालों पर भी जुर्माना हो,

इनके इजहार ए इश्क पर भी बंदिश की जाए"


"इफ़रात में बलखाते हैं, कुछ यूं ही ये हुश्न वाले,

महताब की लर्जन पर भी एक सीमा की जाए,

हसीनों पर यूं ही जुल्फें झटकने पर हो गुनाहगारी, 

इन्हे कभी मोहब्बत न करने की सजा दी जाए"


"कर लो दर्ज ये सभी दफ़ाएं कानून ए मोहब्बत में 

इश्क की आजमाईश में कोई असीर ना मारा जाए"


'अक्स'

Monday, April 10, 2023

"बशर"

 "मुर्दों के शहर में कभी बशर नही मिलते,

मिलती है बस राख पर अशर नही मिलते,

यूँ तो अंदाज तेरे शहर का है बड़ा ही संजीदा,

दिल को जो जोड़ लें वो मुंतशर नही मिलते"


"यूँ तो ख़्वाबों के शहर में मेरा जाना है रोज ही,

बिस्तर को सलवटों से सजाना है रोज ही,

जिंदा है ये शहर महज जज़्बातों के दम पर,

ज़िंदादिली के ऐसे फिर मंजर कहाँ मिलते" 


"रूह जख्मी है पर ज़ख्म से लहू नही रिस्ता,

अपनो की आस्तीनों में अब खंजर नही छिपते,

लगता है तेरे शहर का बस  यही है एक कायदा,

मिल जाते हैं बस ज़ख्म मगर मरहम नही मिलते"


"वो तो आवारगी की आदत है हमे ए 'अक्स'

फक़त बख़्त बिन ऐसे नादिर बशर नहीं मिलते"


'अक्स'

"मेरा दर्द"

"जब से सभी के दर्द से, जुड़ने लगा हूँ मैं, 

जाने कितनी निगाहों में,  कुढ़ने लगा हूँ मैं ,

मुद्दत हुई बहुत मिले,  मुझे मेरे अकील से,

उसको भी दरकिनार कर, जाने लगा हूँ मैं"


"अश्कों को बहने की अब, इज़ाज़त नही कोई,

सैलाब ए रंज ओ गम को अब, पीने लगा हूँ मैं,

यूँ तो सहर और शाम का, रिश्ता है मुझसे खास,

फिर क्यों दोनों के नाम से, जलने लगा हूँ मैं"


" तन्हा हूँ जर जमीन से, मयस्सर भी नही एक छत,

 जुस्तजू ए फिरदौस तो, फिर भी करने लगा हूँ मैं,

मिलता हूँ खुशमिजाजी से, ज़ानिब चाहे कोई हो,

अपने ही अक्स से मगर, क्यों कटने लगा हूँ मैं"


"रवायतें दुनिया की हैं बस, मिलना और रुखसती,

अपनी ही रवायतें गढ़ने में, जाने क्यों लगा हूँ मैं,

कहता हूँ सच और, जुबां बन जाती है जहर 'अक्स'

फिर भी सभी को सच क्यों, कहने लगा हूँ मैं"


'अक्स'

Wednesday, October 12, 2022

इंसानी फ़ितरत

"पाकर मंज़िल, मुश्किल-ए-परवाज़ भूल जाता है,

इंसान बड़ा संगदिल है, हमराह भूल जाता है,

राहों की मुश्किलों में, जो खाई हैं उसने ठोकरें,

उनसे संभालने वाले वो, हाथ भूल जाता है" 


सोता है बेफिक्री से, हसीन ख्वाबों में खोकर,

अपनी निगहबानी में लगी, नज़रें भूल जाता है,

करता है रस्क अपनी, मिथ्या बुलंदियों पर,

उन्माद के कोलाहल में, संसार भूल जाता है"


"गुरूर में करता है, नीव कुन्द सभी संबंधो की,

उँची उड़ान के दंभ में, ज़मीन को भूल जाता है,

हवाई किले में बाँधे, हरदम झूठ के पुलिंदे, 

गैरों के झाँसे में, अपनो को भूल जाता है"


"इंसान अपनी फ़ितरत से कब बाज़ आता है,

इंसान अपनी फ़ितरत से कब बाज़ आता है"


'अक्स'

Tuesday, July 5, 2022

मयखाना

'दोस्त बिखर जाते हैं,यार बिखर जाते हैं,

 अच्छे अच्छे यहां दिलदार बिखर जाते हैं,

 ये कोई सराय नही,मयखाना है साहेब,

 मय में जो डूबे,घर बार बिखर जाते है'

 

'यूँ तो मयखाने की गलियाँ, तंग नही होती,

 जाने क्यूँ फिर इनमे, जुलूस बिखर जाते हैं,

 टकराते हैं जब जाम, एक हुक सी उठती है,

 कहीं मिलते हैं दिल,कहीं अरमान बिखर जाते हैं'


'उम्दा सबसे किरदार, साकी का होता है,

 होठों पे हँसी, चाहे दिल में गम होता है,

 पेश करती है जाम, हर खास ओ आम को,

 बहकते हैं पीकर कुछ, पीकर बिफर जाते हैं'


'मयखाना भी कभी लगता,जनता की एक कचहरी,

 कट्टर दुश्मन भी बनकर,जहाँ से यार निकल आते हैं,

 लानत है अक्स, एक बार जो मयखाने ना गया,

 जाम ए मय से मन के, सारे गुबार निकल जाते हैं'


'अक्स'

कशमकश

 'हिन्दू हूँ मैं या एक मुसलमान हूँ मैं,

अजब कशमकश है, क्या इंसान हूँ मैं,

किये मंदिर के फेरे और नमाज़ ए मस्जिद भी,

हूँ गीता का श्लोक या आयत ए कुरान हूँ मैं'


'फूलों में खेला कभी लिपटा हूँ चादरों में,

'बन कर तदबी का धागा, बंधा कलाइयों में,

नवरात्र में भजन गाये, रोजो में अजान दी है,

हूँ कन्या पूजन जीमण या शाम की इफ्तारी,

दोनों ही सूरतों में, अहद ए शबाब हूँ मैं '


'जला हूँ बन कर रावण, कुर्बान हुआ ईदी में,

हर्ष ओ उल्लास देखा मैनें, दोनों ही तरफा है,

गूंजा जो जयकारो में, झूमा नमाज में भी,

आंठवा सरगम का शायद अब शब्द हूँ मैं'


'राम का हूँ वानर या रहीम का मैं सूफी,

धोखे के वार से हुआ, लहू लुहान हूँ मैं,

राम और रहीम में क्या फ़र्क है ये बोलो,

जबकि फकत मिट्टी का एक इंसान हूँ मैं'


'अक्स'

Sunday, March 20, 2022

होली का हुड़दंग

आया होली का हुड़दंग,

भरे हैं सबके मन में रंग

हो बोलो सारा रा रा,


आयी है रंगों की बारात, 

साथ में खुशियां लिए अपार,

हो बोलो सारा रा रा,


घोट ली सबने जमकर भंग,

उड़ाएं तरह तरह के रंग,

हो बोलो सारा रा रा,


पुते हैं सारे रंग गुलाल,

क्या जाने चेहरे और क्या बाल,

हो बोलो सारा रा रा,


जुड़े हैं लोगो के हुज़ूम,

गा रहे फगवा झूम झूम

हो बोलो सारा रा रा,


झूमे मस्ती में सब नर नार,

उड़ायें रंग-अबीर अपार

हो बोलो सारा रा रा,


बच्चों की नटखट टोली,

कर रही सबसे ही ठिठोली,

हो बोलो सारा रा रा,


गुबारे चलें गोली की चाल,

कर रहे लोगो को बेहाल,

हो बोलो सारा रा रा,


बन रहे गुंझिया और मिठाई,

झूम रही कचौरी और कढ़ाई,

हो बोलो सारा रा रा,


एक ये रंगों का त्योहार,

मिटाता आपस का सब बैर

हो बोलो सारा रा रा


'अक्स'

Friday, August 27, 2021

खलिश

"आज आईना मुझसे नाराज़ सा है,

मेरे असास की दरारें, दिखाता ही नही,

आदिल ये मेरा हमसफर, रहा है सदियों से,

इक्तिज़ा ये आब-ए-आईना की, जानता ही नही"


"वक्त मुकर्रर है मेरा, आशिक़ से मिलने का,

ख़लिश में बंधा है पाँव, आगे बढ़ता ही नही,

गंजीदा सा है मेरा अक्स, संभालूं तो कैसे,

गिला करता है, गुलिस्तां गुल खिलाता ही नही"


"गवारा होती नही अब, ये चमक चिलमन की,

चमन में मेरे चराग, अब कोई जलाता ही नही,

जुम्बिश कहूँ या चस्मक, फ़क़त नज़र का फेर है,

अब्र के फेर में अब, कोई जमजम पिलाता ही नही"


"अल्फ़ाज़ मेरे टूटे है अब, अज्ज करते करते,

खंडहर हुई इमारत मगर, कोई बसाता ही नही,

कीमत मेरे ज़मीर की, है यूं तो बस एक सच,

अफसोस दुनिया में ये बोली, कोई लगाता ही नही"


'अक्स'

Wednesday, July 7, 2021

उम्मीद

"होकर नाउम्मीद, वो यूं रोया होगा,

ख़ुश्क अश्कों में, खुद को डुबोया होगा,

तासीर उस ताबिश की, होगी जाने क्या,

इल्मे अंजाम में, ख़ुदी को गंवाया होगा"


" ख़ुत्बा करने वाले से, तौबा की होगी,

इब्तिसाम को, क़ल्बे कानून बनाया होगा,

आमद में अज़ीज़ों की, बिछाये जो अब्सार,

पर अफसोस, अन्जुमन में कोई न आया होगा"


"आब ए तल्ख, कर लिए होंगे जज्ब उसने,

जब अभी अब्ना ने उसे ठुकराया होगा,

अल्फ़ाज़ बिखर गए होंगे, यूँही टूट कर,

आदिल को जग,  जहन्नुम नज़र आया होगा"


"नाचार, नाताक़त, उसे समझा है सभी ने

 तारीक को उसने, तबस्सुम से मिटाया होगा,

नादिम रहा उम्र भर , वो नबी के ख्याल में,

नुमाइश उसे जग में, कभी करना न आया होगा"


'अक्स'

Friday, June 25, 2021

महामारी

 "कुछ की होगी खता हमने,

जो ये महामारी आयी है,

बनकर एक काल दंश जो,

पूरी मानवता पर छाई है"


"किया जंगल से खिलवाड़ कहीं,

 कहीं नदियों में आग लगाई है,

विकास की एक झूठी जिद ने,

आफत दुनिया पर ढाई है"


"चमगादड़ की लेकर आड़ कहीं,

हमने प्रकृति की हंसी उड़ाई है,

जैविक हथियार की अंधी दौड़ में,

अपनो की ही मौत बनाई है"


"कोई खून के आंसू रोता है,

कोई सब अपनो को खोता है,

सब लिए सिलेंडर भाग रहे,

साँसों की अब ये लड़ाई है"


"ना अस्पताल में बेड कहीं,

ना ही मिल रही दवाई है,

एक एक इंजेक्शन पर लड़ मरे सब,

अब यहां हर कोई आततायी है"


" निज़ाम सो रहा घोड़े बेच,

 हो रही न कोई सुनवाई है,

प्रजा का सुनकर हो हल्ला,

उसने कानो में रुई जमाई है"


"खुद ही करना, खुद ही भरना,

लोगो को सीख ये आयी है,

है राजा ना कोई, रंक यहां,

ये महामारी सबको सिखलाई है"


"करना होगा हमे गहन विचार,

क्यों ये महामारी आयी है"

'अक्स'

Monday, June 14, 2021

ख्वाहिश

 "ख़ुश्क, खस्ता हाल है आज हर ज़मीर,

ख्वाहिशों से लबालब, इंसां नज़र आता है,

खास ओ आम में फ़र्क़, अब मुमकिन ही नहीं,

ग़ुम ग़ज़िदा अब, हर बेकरार नज़र आता है"


"गुमगश्ता ज़िन्दगी है, अब इन राहों में कहीं,

गर्दिशों में फंसा, हर नादाँ नज़र आता है,

अस्हाब मान बैठे हैं खुद को, कुछ जर खरीद गुलाम,

अफ़सुर्दा अलीम भी अब, अपने इल्म को रोता है"


"इफ़्रात की बीमारी, खा जाती है फ़ज़ल को,

इनाद का एक पौधा, पनपता नज़र आता है,

इबादत की नही इबारत, इस जहां में ओर कोई,

ख़िदमत हो गर इंसां की, बस नूर बरस जाता है"


"बे ज़ार, बे कस, बे खुद ,है ये पासबान चमन का,

बेक़ल जिसकी फ़िक्र में, हर गुल नज़र आता है,

समझे है खुद को कातिब, इस बज़्म में हर कोई, 

मुग़ालते में इश्क़ के, 'अक्स' बर्बाद हुआ जाता है"

'अक्स'

Wednesday, June 9, 2021

अल्फ़ाज़

 "कुछ यूं उधड़े अल्फ़ाज़ सिल लिए मैंने,

डोर कच्ची थी मगर काम आ गयी,

ज़हमत जो उठाई , कभी कुछ कहने की,

वो तबस्सुम मेरे लफ़्ज़ों पे छा गयी"


"तर्जुमान को भी खोजा, कहीं मिल जाये,

सुर्ख लबों की ये चुन्नटें अब खुल जाएं,

तसल्ली न मिली, तारिक मिलता गया,

तिशनगी उस नाआशना की, जेहन पे छा गयी"


"दानिश भी परेशां हैं, मेरे हाल को लेकर,

फ़ितरत मेरे मर्ज़ की , कुछ यूं गुमा गयी,

रोग है फुराक़ का या फ़ुवाद का ए 'अक्स',

इब्तिला थी मेरी, पर सबको रुला गयी"

'अक्स'

Tuesday, June 8, 2021

तलाश -2

 "मेरी नाशाद ख्वाहिशों को नवाज़िश की तलाश है , 

नाचीज़ को जो समझे , उस निगाह की तलाश है,  

फिरता हूँ दर ब दर , किसी फ़क़ीर की तरह,

इस रूह ए नामुराद को, नबी की तलाश है ।"


"अर्ज़मन्द यहां कौन है, जरा सामने तो आये, 

नाशुकरौ की इस अन्जुमन में, तसरीफ तो लाये,

बैठे हैं  दिल थाम के , सब जिसकी आमद में,

उसको भी इस जहां में आदिल की तलाश है"


"इश्राक की एक किरण आ जाए कहीं से,

अन्ज को जाने कब से अब्र की प्यास है,

अल्फ़ाज़ गिर गये गले में, तालू से फिसल कर,

अब्सार  को जमाने से नमी की तलाश है"


"आलिम की आवाज़ यहां अब सुनता नही कोई,

अब सब को आब ए आईना में, जन्नत की आस है,

स्वीकार कर सके गर, कर लेना तू भी 'अक्स'

ख़ुदी के साथ रहकर भी, तुझे खुद की तलाश है"

'अक्स'

Thursday, June 3, 2021

क्या लिखूं

"खैर ओ गुरबत के इस मसौदे का हल नही मिलता,

तिरा नज़र डालूं ,   बस कयामत नज़र आती है,

ज़ियारत सा भरा रहता था जो हर एक चौबारा,

नाचारों का वहां अब एक गट्ठर नज़र आता है"


 "इस जहां की खुशियों को दीमक लग गयी है शायद

हर ओर बेकशी और बेबसी का मंजर नज़र आता है,

सुकून ए दिल की तलाश में भटक रहा हर कोई,

खुद के कांधो पर खुद की, न’अश लिए जाता है"


 त्राहि माम त्राहि माम सुनाई पड़ता है हर ओर,

न नौनिहाल कोई अब  खिलखिलाता नज़र आता है,

कितनो के अपने बिछड़ गए, इस ख़ता ग़ुबार में,

हर घर के आगे अब एक शमशान नज़र आता है"


 "निज़ाम की पेशानी पे फ़क़त नही कोई शिकन,

उसकी अदब अन्जुमन की यही तो निशानी है,

अत्तफ़ाल कितने अफ़सुर्दा किसको है क्या खबर,

इनके लिए लहू भी अब आब-ए-तल्ख़ मानी है"


 "सूखे पड़े हैं आबे ए चश्म, क्या आरज़ू करें,

 तिरा काज़ी के हाथों कत्ल की साज़िश नज़र आती है,

काइल कुबूलनामा उन्होंने कायदों में नही पढ़ा लिखा,

ख़ज़ां में बस ख़ुदी का जो ख़ुमार चढ़ा जाता है"

"आशुफ़्ता है सारी प्रजा, न इज़्तिराब से कोई निजात,

इन्तिज़ाम में, इन्तिख़ाब के, उफ़्ताद को दावत दे डाली है,

ख्व़ाहिश हुई न पूरी जाहिल की , रहा लब्बो लुबाब निल

ग़़फलत में गुरूर करना,  बस जाहिलों को ही आता है"


"मैं क्या लिखूं , क्या ना लिखूं, है जुस्तजू यही,

आमद में खुशियां लिख दे, गर तुझे आता है ???"

'अक्स'

Tuesday, December 29, 2020

एक राजमार्ग की अभिलाषा

"चाह नही, मैं अपनो के 

दंगो में तोड़ा जाऊं,


चाह नही, आंदोलनो में

लोगो का सिरहाना बन जाऊं,


चाह नही, देखूं मीलों,

बच्चों, बूढ़ों को पैदल चलते,


चाह नही, देखूं मैं दौड़ती,

गाड़ियों को आपस में भिड़ते,


एक तमन्ना है बस,

अच्छे से बनाया जाऊं,


दौड़ें जिस पर गाड़ी सरपट,

लोगों को घर पहुँचा पाऊँ"


'अक्स'

Thursday, October 1, 2020

गुदड़ी का लाल

"गुदड़ी का लाल था वो, मुगल सराय से आया,

एक कमाल था जो, मर कर भी मर ना पाया,

घर में था सबसे छोटा, नन्हे थे सब बुलाते,

फिर भी बड़ा बना वो, सबका था मान बढ़ाया"


"ली शास्त्री की उपाधि, जब उसने काशी से,

परचम फिर अपने नाम का, जग में फहराया,

मरो नहीं, मारो का नारा, था दिया देश को,

नाकों चने था फिर उसने अंग्रेज़ो को चबवाया"


"मिली जब आज़ादी तो देश हुआ एकजुट,

गुदड़ी के लाल को सबने, सर माथे पर बिठाया,

पैंसठ के युद्ध में जब,  सब होश खो रहे थे,

जय जवान-जय किसान नारे से जोश था जगाया"


"पहुँचा जब ताशकंद, थर थर थे काँपे दुश्मन,

जुड़ा था जमीं से पर, आसमाँ को भी झुकाया,

सारी उम्र रहा वो, एक संघर्ष का मसीहा,

सादा जीवन उच्च विचार को साकार कर दिखाया"


'अक्स' 

Sunday, September 13, 2020

नारी शक्ति

"माँ, बहन, बीवी और बेटी, जाने कितने किरदार निभाती है,

नारी के ही बस में है, हर गम सहकर मुस्कुराती है,

देती है जहाँ अनगिनत कुर्बानियाँ, अपनो की खातिर,

वहीं रणचंडी बन, दुश्मन का लहू भी पी जाती है"


"घर के अंदर हो या बाहर, चलती है मिलाकर कंधे से कंधा,

अपने शौर्य और कारनामो से सबको चकित कर जाती है,

घर की रसोई या जंग का मैदान, सब बराबर उसके लिए,

यहाँ दिल में उतरे , वहाँ दुश्मन के सीने पर चढ़ जाती है"


"ना जाने अभी ओर कितने कीर्तिमान गढ़ने हैं उसको,

हर कदम नयी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है,

ज़िंदगी की हर चुनौती को हराने का माद्दा लिए,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है"


'अक्स'