Showing posts with label हिन्दी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दी. Show all posts

Monday, December 1, 2025

नौकरी


परदेश में नौकरी का, तिरा आलम ये हो गया,

घर था जो मेरे लिए हमेशा, अब मकाँ हो गया,

गूंजता था जहां नाम मेरा, कभी बेतरीबी से,

आज वहीं तहजीब की, जंजीरों में कैद हो गया ।


आफिस में तो थी ही, पदवी साहब के नाम की,

अपनो में भी अब, इसी नाम से बदनाम हो गया।

गले में डाल बाहें, कभी घूमता था साथ जिनके,

उन्ही यारों से मिलना भी, अब दुश्वार हो गया ।


मुझे तो मिल गए के अपने, इस अंजान शहर में,

मगर बच्चों से दादा दादी का वो प्यार रह गया,

छीनी है बीवी से भी ननद ओ भावज की चुहलबाज़ी,

हुआ था जो एक, देवरानी जेठानी का करार रह गया ।


निकला था देने खुशियाँ, अपनो को हर जहां की,

पर अपनी ही गफलतों का, होकर मैं शिकार रह गया,

लगती है ये नौकरी अब, उस जालिम साहूकार जैसी

जिसके कर्ज़ का मैं बनकर, बंधुआ कर्ज़दार रह गया ,

जिसके कर्ज़ का मैं बनकर, बंधुआ कर्ज़दार रह गया ।


'अक्स'


Wednesday, June 7, 2023

इश्क़ की कचहरी

"लगा के इश्क़ की कचहरी, ये दफा दर्ज की जाए,

निगाहें शौक के कातिलों को भी सजा दी जाए,

लगाई जाए ताला बंदी इनकी हंसीं निगाहों पर, 

सुर्ख लबों की तबस्सुम भी नजरबंद की जाए"


"करते हैं दावा इश्क का ये, उन्माद ए हुश्न में,

राह ए मोहब्बत पर कोई दरबान बिठाया जाए,

निगाहें शौक से मरने वालों पर भी जुर्माना हो,

इनके इजहार ए इश्क पर भी बंदिश की जाए"


"इफ़रात में बलखाते हैं, कुछ यूं ही ये हुश्न वाले,

महताब की लर्जन पर भी एक सीमा की जाए,

हसीनों पर यूं ही जुल्फें झटकने पर हो गुनाहगारी, 

इन्हे कभी मोहब्बत न करने की सजा दी जाए"


"कर लो दर्ज ये सभी दफ़ाएं कानून ए मोहब्बत में 

इश्क की आजमाईश में कोई असीर ना मारा जाए"


'अक्स'

Monday, April 10, 2023

"बशर"

 "मुर्दों के शहर में कभी बशर नही मिलते,

मिलती है बस राख पर अशर नही मिलते,

यूँ तो अंदाज तेरे शहर का है बड़ा ही संजीदा,

दिल को जो जोड़ लें वो मुंतशर नही मिलते"


"यूँ तो ख़्वाबों के शहर में मेरा जाना है रोज ही,

बिस्तर को सलवटों से सजाना है रोज ही,

जिंदा है ये शहर महज जज़्बातों के दम पर,

ज़िंदादिली के ऐसे फिर मंजर कहाँ मिलते" 


"रूह जख्मी है पर ज़ख्म से लहू नही रिस्ता,

अपनो की आस्तीनों में अब खंजर नही छिपते,

लगता है तेरे शहर का बस  यही है एक कायदा,

मिल जाते हैं बस ज़ख्म मगर मरहम नही मिलते"


"वो तो आवारगी की आदत है हमे ए 'अक्स'

फक़त बख़्त बिन ऐसे नादिर बशर नहीं मिलते"


'अक्स'

"मेरा दर्द"

"जब से सभी के दर्द से, जुड़ने लगा हूँ मैं, 

जाने कितनी निगाहों में,  कुढ़ने लगा हूँ मैं ,

मुद्दत हुई बहुत मिले,  मुझे मेरे अकील से,

उसको भी दरकिनार कर, जाने लगा हूँ मैं"


"अश्कों को बहने की अब, इज़ाज़त नही कोई,

सैलाब ए रंज ओ गम को अब, पीने लगा हूँ मैं,

यूँ तो सहर और शाम का, रिश्ता है मुझसे खास,

फिर क्यों दोनों के नाम से, जलने लगा हूँ मैं"


" तन्हा हूँ जर जमीन से, मयस्सर भी नही एक छत,

 जुस्तजू ए फिरदौस तो, फिर भी करने लगा हूँ मैं,

मिलता हूँ खुशमिजाजी से, ज़ानिब चाहे कोई हो,

अपने ही अक्स से मगर, क्यों कटने लगा हूँ मैं"


"रवायतें दुनिया की हैं बस, मिलना और रुखसती,

अपनी ही रवायतें गढ़ने में, जाने क्यों लगा हूँ मैं,

कहता हूँ सच और, जुबां बन जाती है जहर 'अक्स'

फिर भी सभी को सच क्यों, कहने लगा हूँ मैं"


'अक्स'

Sunday, March 20, 2022

होली का हुड़दंग

आया होली का हुड़दंग,

भरे हैं सबके मन में रंग

हो बोलो सारा रा रा,


आयी है रंगों की बारात, 

साथ में खुशियां लिए अपार,

हो बोलो सारा रा रा,


घोट ली सबने जमकर भंग,

उड़ाएं तरह तरह के रंग,

हो बोलो सारा रा रा,


पुते हैं सारे रंग गुलाल,

क्या जाने चेहरे और क्या बाल,

हो बोलो सारा रा रा,


जुड़े हैं लोगो के हुज़ूम,

गा रहे फगवा झूम झूम

हो बोलो सारा रा रा,


झूमे मस्ती में सब नर नार,

उड़ायें रंग-अबीर अपार

हो बोलो सारा रा रा,


बच्चों की नटखट टोली,

कर रही सबसे ही ठिठोली,

हो बोलो सारा रा रा,


गुबारे चलें गोली की चाल,

कर रहे लोगो को बेहाल,

हो बोलो सारा रा रा,


बन रहे गुंझिया और मिठाई,

झूम रही कचौरी और कढ़ाई,

हो बोलो सारा रा रा,


एक ये रंगों का त्योहार,

मिटाता आपस का सब बैर

हो बोलो सारा रा रा


'अक्स'

Sunday, September 13, 2020

नारी शक्ति

"माँ, बहन, बीवी और बेटी, जाने कितने किरदार निभाती है,

नारी के ही बस में है, हर गम सहकर मुस्कुराती है,

देती है जहाँ अनगिनत कुर्बानियाँ, अपनो की खातिर,

वहीं रणचंडी बन, दुश्मन का लहू भी पी जाती है"


"घर के अंदर हो या बाहर, चलती है मिलाकर कंधे से कंधा,

अपने शौर्य और कारनामो से सबको चकित कर जाती है,

घर की रसोई या जंग का मैदान, सब बराबर उसके लिए,

यहाँ दिल में उतरे , वहाँ दुश्मन के सीने पर चढ़ जाती है"


"ना जाने अभी ओर कितने कीर्तिमान गढ़ने हैं उसको,

हर कदम नयी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है,

ज़िंदगी की हर चुनौती को हराने का माद्दा लिए,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है"


'अक्स'


Friday, October 18, 2019

करवा चौथ

"कुछ इस तरह से इश्क़ की किश्तें भर रहा हूँ,
हर करवाचौथ पर अब मैं व्रत कर रहा हूँ,
बीवी है बैठी खाये, काजू, बादाम , पिस्ता,
और मैं तो चाय तक को भी तरस रहा हूँ "

"है चाँद भी अब दुश्मन, खिड़की से भी न झांके,
पाने को जिसके दर्शन, छलनी लिए खड़ा हूँ,
कृपा है श्रीमती जी की, जो साथ में खड़ी हैं,
वरना तो लेकर आसन पाटी, कब से वो पड़ी हैं"

"साल का ये एक दिन, है बड़ा गज़ब जी
बनने की आज शेर, हर एक चूहे को पड़ी है,
कहते हैं मियां अक्स, मत अतीत को तुम भूलो,
सामने फिर कल से, वही पुरानी शेरनी खड़ी है"

'अक्स,

Monday, March 18, 2019

सुख चैन


"सुख चैन कहाँ वो नींद कहाँ,
जो दादा के संग मैं पाता था,
दादी की गोद में सर रख कर,
जब सपनो में उड़ जाता था"

"वो खेल खिलौने मिट्टी के,
यारों संग करना वो हुल्लड़,
जब मार कुलाँचे पेड़ो पर,
बस दम भर में चढ़ जाता था"

"जब फसल लहलहाती खेतो में,
तन मन को खुश कर जाती थी,
फिर शाम भरे चौपालो में ,
शुभ मंगल गान मैं गाता था"

"वो गिनकर रातों को तारे,
चारपाई पर उधम मचाता था,
फिर पापा की गुर्राहट से डरकर,
दादा के पीछे छुप जाता था"

"पौं फटे वो सुनना चिड़ियों का कलरव,
 बड़े बुज़ुर्गो को झुककर शीश नवाता था,
 जब खाड़िया पुती स्लेटों को झोले में लेकर जाते थे,
 शहतूत की बेंत के आगे सब भीगी बिल्ली बन जाते थे'
 

"वो सौंधी सौंधी सी यादें,
अब भी जीवन को महकाती हैं,
छुना चाहूं उनको जो हाथ बढ़ा,
बस पलकों को नम कर जाती हैं"

'अक्स'


Friday, January 4, 2019

बेटियाँ

"कहते हैं सब बेटियाँ पराई होती हैं,
मगर वो घर वालो के दिल में समाई होती हैं,
जहाँ में सबसे पहला स्थान है केवल माँ का,
जिसके चरणों में ईश्वर ने जन्नत बनाई होती है"

"माँ की ममता का होती हैं एक प्रतिरूप जहाँ,
बाप का मान सम्मान, गर्व होती हैं बेटियाँ,
कंचन,कोमल, कोमलांगी का होती हैं पर्यायवाची,
मगर वक़्त पड़ने पर रण चंडी भी बन जाती हैं बेटियाँ"

"माँ बाप से घर से निकल कर जब पहुँचे ससुराल वो,
दो परिवारो, दो संस्कारो के मिलन का उदगम होती है बेटियाँ,
अपने संस्कारो से नये परिवार को प्यार के धागे में पिरोती हैं,
सभी के जीवन का एक संबल बन जाती हैं बेटियाँ"

"घर के चोके चूल्‍हे से लेकर अंतरिक्ष तक पंख फैला रही,
अपने दम पर हर जगह खड़ी नज़र आती हैं बेटियाँ,
माँ, बेटी, बहन और ना जाने कितने किरदार निभाते हुए,
बेटो को पीछे छोड़कर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं बेटियाँ"

"अक्स'

Wednesday, November 7, 2018

दीवाली


"दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है,
इस उमंग में डूबा हर एक परिवार है,
लक्ष्मी गणेश का आशीर्वाद बरस रहा सभी पर,
सत्य की हर ओर हो रही जय जय कार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

"अंधेरे पर रोशनी की जीत का है एक प्रतिरूप,
अपनो संग मिलने का विचार अंगीकार है,
माता पिता, बंधु जन  सभी खुश हैं,
दुख और अंधकार न किसी को अब स्वीकार है,
दिवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

"हर्ष ओ उन्माद फैला है हर तरफ,
मिठाई, मेवों और पटाखों की भरमार है,
भिन्न भिन्न रंगों के संगम से बन रही रंगोली,
पुष्पमालाओं से सजा आज हर द्वार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

'अक्स'

Monday, September 17, 2018

इश्क़ ए नागवार

"इश्क़ ए नागवार का हम रोग ले बैठे,
एक संगदिल से क्यूं ये दिल लगा बैठे,
कहती है दुनिया जिसको एक खुशनुमा एहसास,
उसमे हम अपने सभी अरमान जला बैठे"

सीने से उठती रही दर्द की एक टीस,
हर टीस को अपनी हम धड़कन बना बैठे,
चाहा था जिस खुदगर्ज़ को दिल ओ जान से कभी,
उसकी हर एक याद को अपने जेहन से मिटा बैठे"

रफ्ता रफ्ता सरकती रही ये जिंदगी हर डगर,
अपनी हर एक मंज़िल का हम रास्ता भुला बैठे,
खुदा की इबादत में हमसे होने लगी नागा,
एक नाखुदा को जबसे हम खुदा बना बैठे"
'अक्स'

Sunday, June 24, 2018

राह ए मुकाम


"राह ए मुकाम में मेरी, मुश्किलों का आशियाना है,
फिर भी हमे तो अपनी, हर मंज़िल को पाना है,
अपनों का साथ हो अगर, कट जाता है हर सफ़र,
वरना अकेले भी चलकर, बस जीवन जीते जाना है"

"रास्ते में किसी पड़ाव पर, कभी रुकता हूँ चार पल,
वरना इस जीवन सरिता में, अविरत ही बहते जाना है,
काम, दंभ, लोभ , मोह, सब इस पथ में कठिनाईं हैं,
जो इनसे पार पा सका, उसने ही जीवन जाना है"

"उम्र के हर एक पड़ाव पर, हमने सीख ये पाई है,
बढ़ना है अगर जग में आगे , धारा के विपरीत जाना है,
जिस दौर के हम बाशिंदे हैं, वहाँ हर पथ पर उम्मीदें हैं,
इन उम्मीदों को राह बना, हमे हर मंज़िल को पाना है"

"अक्स"

Monday, June 27, 2016

बेपरवाह ज़िंदगी

"बड़ी बेपरवाह हो गयी है ज़िंदगी आजकल,
इधर तो कभी उधर निकल पड़ती है,
आवारगी में इस कदर गुम हुई है,
अपनी राह ए मंज़िल को भूल पड़ती है"

"आब-ए-तल्ख़ में गिरफ्तार है इस कदर,
गफलत में गलिजो के लिए बिछ पड़ती है,
सजदे में सर झुकाती है शैतान को,
अंजुमन में नाशूक्रो के पड़ी रहती है"

"अपनी ज़िल्लत को भूल गयी है शायद,
जाने किस गुरूर में दोजख से गुज़र पड़ती है,
क्यूँ ग़ज़ल में समेटने की इच्छा रखता है अक्स,
ये वो शह है जो हर लय में बसर करती है"

"अक्स"

Saturday, January 30, 2016

धुंध भरी सुबह

"धुंध भरी सुबह में सड़क के एक ऒर, 
 जाने वो कौन चली जा रही थी,
 सुर्ख ओ स्याह सफेदी भरा चेहरा लिए,
 मानो ठण्ड को आगोश में भरे जा रही थी"
"सर से ढलकते दुपट्टे को सही करने में,
 खुद एक अजंता की मूरत बनी जा रही थी,
 मानो भिड़ने निकली हो बर्फीली हवाओं से,
 संभलती कभी लड़खड़ाये जा रही थी"
"अश्कों के बहते दरिया को थामने की कोशिश में,
 नैनो पर पलकों की लगाम लगाये जा रही थी,
 समय बीतने के साथ वो भी धुंधलाती हुई,
 शने: शने: धुंध में विलीन होती जा रही थी"
"धुंध भरी सुबह में सड़क के एक ऒर,
 जाने वो कौन चली जा रही थी"
                                          "अक्स"

Wednesday, January 27, 2016

शमा-परवाना

"ज्यों शमा करती है इंतज़ार किसी परवाने का,
तू भी आकर देख ले हाल अपने दीवाने का,
दीवानावार भटकता रहता है वो दर बदर,
होश कहाँ रहा उसे अब इस ज़माने का"

"महबूब के नाम का रोज़ पड़ता है कलमा,
उसी की रहगुज़र में सजदा उस मस्ताने का,
यादों में उसकी टूट कर यूँ बिखर गया है,
ज्यों छलकता जाम हो किसी पैमाने का"

"अपने नाज़ ओ अंदाज़ में वो गुम हैं इस कदर,
उन्हे इल्म ही नही किसी दिल के खो जाने का,
उनकी इसी अदा पर हम मर मिटें हैं अक्स ,
वरना दुनिया में कहाँ दम हमे आज़माने का"
                                                   "अक्स"

Tuesday, September 29, 2015

फ़लसफ़े

'अंधेरो में रोशनी की किरण ढूँढ लेंगे,
 गमों में खुशी का एक पल ढूँढ लेंगे,
 कहती है जिसको जफ़ा ये सारी दुनिया,
 हम उस फ़लसफ़े में भी वफ़ा ढूँढ लेंगे"

"है फैला चहुं ओर बेखयाली का आलम,
हम इस आलम में भी एक अदा ढूँढ लेंगे,
तरसते रहे किसी की सरपरस्ती को हर पल,
अब खुदी में हम अपना रह्बर ढूँढ लेंगे"


"है तेरी सदा का इतना असर देख 'अक्स',
वीराने में भी आज गुल खिल उठे हैं,
हो ऐसा ही जज़्बा हर एक दिल में तो क्या,
ना हम दुनिया के लिए सुकून ढूँढ लेंगे"

'अक्स'

Sunday, May 10, 2015

" माँ "

"बच्चो की एक आह पर जिसका कलेजा हिल जाए,
दर्द औलाद को हो और आँख उसकी भर आए,
जो हमे फूलों पर सुला खुद कांटो पर सोती है,
हमे सुलाने की खातिर रात भर अपनी नींद खोती है,
वो माँ होती है, वो माँ होती है"
"कहते है परिवार एक फलदार व्रक्ष है,
पिता जिसका तना और औलाद फल होती है,
पर लोग ये क्यूँ भूल जाते हैं अक्सर,
कि इस पेड़ को जो जड़ सींचती ओर संभालती है,
वो माँ होती है, वो माँ होती है"
"हमारी हर अनकही अभिलाषा समझकर पूरा करती,
हमारे ताने ओर झिड़कियाँ सुनकर भी कुछ ना कहती है,
हम अपनी मस्ती में उसे भूल भी जाएँ तो क्या,
हर कदम हर पल हमारी सलामती की दुआ करती है,
वो माँ होती है, वो माँ होती है"
"भगवान का ज़मीन पर आना मुश्किल था,
अपनी बनाई दुनिया में निभाना मुश्किल था,
तो उसने हमे एक सौगात दे दी कुछ इस तरह,
जिसके आँचल में शांति और चरणो में जन्नत होती है,
वो माँ होती है, वो माँ होती है"
"अक्स"

Tuesday, July 15, 2014

दीदार ए तसव्वुर

"गुल से मिलकर इस कदर गुलज़ार हो गया,
मैं उनकी मोहब्बत में गिरफ्तार हो गया,
दीदार ए तसव्वुर की जो एक आस थी जगी,
रुखसार वो चिलमन के पर्दों में खो गया"

"यूँ तो बहारें आती और जाती हैं बदस्तूर,
मेरा चमन सदा के लिए खुशगँवार हो गया,
इस जहाँ में हर कली  का रस चूंसते भंवरे,
और मैं किसी कली का निगेह्बान हो गया"

"उस एक मुस्कुराहट पे सौ उम्र हैं कुर्बान,
तरन्नुम में जिसकी हर एक शख्स खो गया,
हर गली की मिट्टी में है एक सौंधी सी खुश्बू,
जिस भी डगर से वो बस एक बार ग़ुज़र गया"

"अक्स"

Saturday, July 5, 2014

फरेब

"मैं इस कदर उसके वजूद में खोता रहा हूँ,
आसमान को भी अपने अश्को से भिगोता रहा हूँ,
वो उड़ ना जाए मेरे जेहन से किसी सपने की तरह,
अनगिनत रातों को खुली आखों से सोता रहा हूँ"

"अपनो ने भी उसी ज़ख़्म को जी भर कर कुरेदा,
जिसको हमेशा जी जान से मैं सीता रहा हूँ,
बेबसी के इस दौर में है हर शख्स गमजदा,
सज़ा उसके फरेब की मैं भी पाता रहा हूँ"

"क्यूंकर ना जला दूं मैं उसके झूठ का पुलिंदा,
हक़ीक़त हमेशा मान जिसे मैं जीता रहा हूँ,
उसके शबाब पर फिदा है दुनिया तो मुझको क्या,
मैं रुसवाइयां मिला हर जाम में पीता रहा हूँ"

"अक्स"

Wednesday, December 11, 2013

"एक अजन्मे बच्चे के मन के भाव"

"हे माँ, धरा ये कैसी है,
कैसा है नील गगन प्यारा,
कैसे अविरत बहती सरिता है,
निर्मल जो तन मन कर देती सारा"

"हे माँ, पवन क्यूँ बहती है,

जो सबको जीवन देती है,
पुष्पों में सुगंध भरी किसने,
जो महकाती है जग सारा"

"हे माँ, होते हैं चाँद सितारे क्या,

करता है कौन इन्हे रोशन,
इतनी क्यूँ आग उगलता है सूरज,
घबराता जिससे ये जग सारा"

"हे माँ,ये सुख दुख होते क्या,

क्यूँ उलझा है हर कोई इनमे,
होते हैं रिश्ते नाते क्या'
लगता जिनमे हर कोई प्यारा"

"हे माँ, मेरा मन उत्सुक है,

कब मैं ये दुनिया देखूँगा,
खेलूँगा कब तेरी गोदी में,
कब सबमें खुशियाँ बाटूँगा"

"अक्स"