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Thursday, October 1, 2020

गुदड़ी का लाल

"गुदड़ी का लाल था वो, मुगल सराय से आया,

एक कमाल था जो, मर कर भी मर ना पाया,

घर में था सबसे छोटा, नन्हे थे सब बुलाते,

फिर भी बड़ा बना वो, सबका था मान बढ़ाया"


"ली शास्त्री की उपाधि, जब उसने काशी से,

परचम फिर अपने नाम का, जग में फहराया,

मरो नहीं, मारो का नारा, था दिया देश को,

नाकों चने था फिर उसने अंग्रेज़ो को चबवाया"


"मिली जब आज़ादी तो देश हुआ एकजुट,

गुदड़ी के लाल को सबने, सर माथे पर बिठाया,

पैंसठ के युद्ध में जब,  सब होश खो रहे थे,

जय जवान-जय किसान नारे से जोश था जगाया"


"पहुँचा जब ताशकंद, थर थर थे काँपे दुश्मन,

जुड़ा था जमीं से पर, आसमाँ को भी झुकाया,

सारी उम्र रहा वो, एक संघर्ष का मसीहा,

सादा जीवन उच्च विचार को साकार कर दिखाया"


'अक्स' 

Sunday, September 13, 2020

नारी शक्ति

"माँ, बहन, बीवी और बेटी, जाने कितने किरदार निभाती है,

नारी के ही बस में है, हर गम सहकर मुस्कुराती है,

देती है जहाँ अनगिनत कुर्बानियाँ, अपनो की खातिर,

वहीं रणचंडी बन, दुश्मन का लहू भी पी जाती है"


"घर के अंदर हो या बाहर, चलती है मिलाकर कंधे से कंधा,

अपने शौर्य और कारनामो से सबको चकित कर जाती है,

घर की रसोई या जंग का मैदान, सब बराबर उसके लिए,

यहाँ दिल में उतरे , वहाँ दुश्मन के सीने पर चढ़ जाती है"


"ना जाने अभी ओर कितने कीर्तिमान गढ़ने हैं उसको,

हर कदम नयी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है,

ज़िंदगी की हर चुनौती को हराने का माद्दा लिए,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है"


'अक्स'


Monday, May 13, 2019

अकेलापन

"आज मैं  फिर अकेला रह गया हूँ,
मेरे अपने कहीं पीछे छूट गए,
वो मां की लोरी, पापा की झिड़की
मिट्टी का खिलौना, लकड़ी की गाड़ी,
सब सहेज कर रखे थे एक गुल्लक में,
जिसे नादान दुनिया वाले लूट गए
आज मैं फिर अकेला रह गया हूँ"

"कैसे बताऊं उसमें क्या क्या था संजोया,
वो दादा दादी की मनुहार, जब भी मैं रोया,
चारपाई का झूला वो झंडियों का रेला,
पिट्ठू का खेला वो राम जी का मेला,
करता था जिसमें हुल्लड़, मैं संग दोस्तों के,
गायों की दौड़ से उठता गोधूली का रेला,
उसे भूल सड़को की रैली में खो गया हूँ,
आज मैं फिर अकेला रह  गया हूँ"

" ताऊ चाचा का प्यार, गांव वालों का दुलार,
मेरी बस एक जिद पे सबका विचलित होना,
कागज की नाव या साइकल की होती थी दौड़,
हार कर भी सभी के संग खुशी में शामिल होना,
नापना फलांगो में मोहल्लो की बारादरी,
फिर मार के डर से, चुपके से घर में आना
अब घर छोड़ कर मैं मकान में रह गया हूँ,
आज फिर मैं अकेला रह गया हूँ"
"अक्स”

Monday, March 18, 2019

सुख चैन


"सुख चैन कहाँ वो नींद कहाँ,
जो दादा के संग मैं पाता था,
दादी की गोद में सर रख कर,
जब सपनो में उड़ जाता था"

"वो खेल खिलौने मिट्टी के,
यारों संग करना वो हुल्लड़,
जब मार कुलाँचे पेड़ो पर,
बस दम भर में चढ़ जाता था"

"जब फसल लहलहाती खेतो में,
तन मन को खुश कर जाती थी,
फिर शाम भरे चौपालो में ,
शुभ मंगल गान मैं गाता था"

"वो गिनकर रातों को तारे,
चारपाई पर उधम मचाता था,
फिर पापा की गुर्राहट से डरकर,
दादा के पीछे छुप जाता था"

"पौं फटे वो सुनना चिड़ियों का कलरव,
 बड़े बुज़ुर्गो को झुककर शीश नवाता था,
 जब खाड़िया पुती स्लेटों को झोले में लेकर जाते थे,
 शहतूत की बेंत के आगे सब भीगी बिल्ली बन जाते थे'
 

"वो सौंधी सौंधी सी यादें,
अब भी जीवन को महकाती हैं,
छुना चाहूं उनको जो हाथ बढ़ा,
बस पलकों को नम कर जाती हैं"

'अक्स'


Friday, January 4, 2019

बेटियाँ

"कहते हैं सब बेटियाँ पराई होती हैं,
मगर वो घर वालो के दिल में समाई होती हैं,
जहाँ में सबसे पहला स्थान है केवल माँ का,
जिसके चरणों में ईश्वर ने जन्नत बनाई होती है"

"माँ की ममता का होती हैं एक प्रतिरूप जहाँ,
बाप का मान सम्मान, गर्व होती हैं बेटियाँ,
कंचन,कोमल, कोमलांगी का होती हैं पर्यायवाची,
मगर वक़्त पड़ने पर रण चंडी भी बन जाती हैं बेटियाँ"

"माँ बाप से घर से निकल कर जब पहुँचे ससुराल वो,
दो परिवारो, दो संस्कारो के मिलन का उदगम होती है बेटियाँ,
अपने संस्कारो से नये परिवार को प्यार के धागे में पिरोती हैं,
सभी के जीवन का एक संबल बन जाती हैं बेटियाँ"

"घर के चोके चूल्‍हे से लेकर अंतरिक्ष तक पंख फैला रही,
अपने दम पर हर जगह खड़ी नज़र आती हैं बेटियाँ,
माँ, बेटी, बहन और ना जाने कितने किरदार निभाते हुए,
बेटो को पीछे छोड़कर सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती हैं बेटियाँ"

"अक्स'

Wednesday, November 7, 2018

दीवाली


"दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है,
इस उमंग में डूबा हर एक परिवार है,
लक्ष्मी गणेश का आशीर्वाद बरस रहा सभी पर,
सत्य की हर ओर हो रही जय जय कार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

"अंधेरे पर रोशनी की जीत का है एक प्रतिरूप,
अपनो संग मिलने का विचार अंगीकार है,
माता पिता, बंधु जन  सभी खुश हैं,
दुख और अंधकार न किसी को अब स्वीकार है,
दिवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

"हर्ष ओ उन्माद फैला है हर तरफ,
मिठाई, मेवों और पटाखों की भरमार है,
भिन्न भिन्न रंगों के संगम से बन रही रंगोली,
पुष्पमालाओं से सजा आज हर द्वार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है,
दीवाली जगमगाते दियो का त्योहार है"

'अक्स'

Monday, June 27, 2016

बेपरवाह ज़िंदगी

"बड़ी बेपरवाह हो गयी है ज़िंदगी आजकल,
इधर तो कभी उधर निकल पड़ती है,
आवारगी में इस कदर गुम हुई है,
अपनी राह ए मंज़िल को भूल पड़ती है"

"आब-ए-तल्ख़ में गिरफ्तार है इस कदर,
गफलत में गलिजो के लिए बिछ पड़ती है,
सजदे में सर झुकाती है शैतान को,
अंजुमन में नाशूक्रो के पड़ी रहती है"

"अपनी ज़िल्लत को भूल गयी है शायद,
जाने किस गुरूर में दोजख से गुज़र पड़ती है,
क्यूँ ग़ज़ल में समेटने की इच्छा रखता है अक्स,
ये वो शह है जो हर लय में बसर करती है"

"अक्स"

Saturday, January 30, 2016

धुंध भरी सुबह

"धुंध भरी सुबह में सड़क के एक ऒर, 
 जाने वो कौन चली जा रही थी,
 सुर्ख ओ स्याह सफेदी भरा चेहरा लिए,
 मानो ठण्ड को आगोश में भरे जा रही थी"
"सर से ढलकते दुपट्टे को सही करने में,
 खुद एक अजंता की मूरत बनी जा रही थी,
 मानो भिड़ने निकली हो बर्फीली हवाओं से,
 संभलती कभी लड़खड़ाये जा रही थी"
"अश्कों के बहते दरिया को थामने की कोशिश में,
 नैनो पर पलकों की लगाम लगाये जा रही थी,
 समय बीतने के साथ वो भी धुंधलाती हुई,
 शने: शने: धुंध में विलीन होती जा रही थी"
"धुंध भरी सुबह में सड़क के एक ऒर,
 जाने वो कौन चली जा रही थी"
                                          "अक्स"

Wednesday, January 27, 2016

शमा-परवाना

"ज्यों शमा करती है इंतज़ार किसी परवाने का,
तू भी आकर देख ले हाल अपने दीवाने का,
दीवानावार भटकता रहता है वो दर बदर,
होश कहाँ रहा उसे अब इस ज़माने का"

"महबूब के नाम का रोज़ पड़ता है कलमा,
उसी की रहगुज़र में सजदा उस मस्ताने का,
यादों में उसकी टूट कर यूँ बिखर गया है,
ज्यों छलकता जाम हो किसी पैमाने का"

"अपने नाज़ ओ अंदाज़ में वो गुम हैं इस कदर,
उन्हे इल्म ही नही किसी दिल के खो जाने का,
उनकी इसी अदा पर हम मर मिटें हैं अक्स ,
वरना दुनिया में कहाँ दम हमे आज़माने का"
                                                   "अक्स"

Saturday, July 5, 2014

फरेब

"मैं इस कदर उसके वजूद में खोता रहा हूँ,
आसमान को भी अपने अश्को से भिगोता रहा हूँ,
वो उड़ ना जाए मेरे जेहन से किसी सपने की तरह,
अनगिनत रातों को खुली आखों से सोता रहा हूँ"

"अपनो ने भी उसी ज़ख़्म को जी भर कर कुरेदा,
जिसको हमेशा जी जान से मैं सीता रहा हूँ,
बेबसी के इस दौर में है हर शख्स गमजदा,
सज़ा उसके फरेब की मैं भी पाता रहा हूँ"

"क्यूंकर ना जला दूं मैं उसके झूठ का पुलिंदा,
हक़ीक़त हमेशा मान जिसे मैं जीता रहा हूँ,
उसके शबाब पर फिदा है दुनिया तो मुझको क्या,
मैं रुसवाइयां मिला हर जाम में पीता रहा हूँ"

"अक्स"

Monday, June 24, 2013

"मेरे पूजनीय माता पिता को समर्पित"

"उंगली पकड़ मुझे चलना सिखाया,
देकर सहारा मुझे उठना सिखाया,
निरा मिट्टी का एक ढेला भर था मैं तो,
घड़ घड़ जिसे तुमने इंसान बनाया"

"जीवन की पहली पाठशाला तुम्ही थे,
तुम्ही में पहला गुरु मैने पाया,
पहला सबक जीवन का पढ़ाया तुम्ही ने
बन पथ प्रदर्शक हमेशा जो काम आया"

"मेरी खातिर भुला दी रातों की नींद अपनी,
मगर मुझे सुख चैन की नींद सुलाया,
सहे कितने ही दुख तुमने मेरी वजह से,
खुशियों के पालने में मुझको झूलाया"

"जीवन की हर कठिन डगर पर संभाला तुम्ही ने,
बीन काँटे पग में फूलों का गळीचा बिछाया,
तुम्हारा ये क़र्ज़ चुकाने की ना हैसियत मेरी,
मैं हूँ भाग्यशाली, आपको माता पिता मैने पाया"

"अक्स"

Friday, May 25, 2012

हसरत

"उसकी हसरतों के नाम हमने ज़िंदगानी कर दी,
उसको पाने की खातिर हर मुश्किल बेमानी कर दी,
वो हँसती रही मेरी खाक हो चुकी हस्ती पर,
क्या जाने वो हमने खुद हर खुशी बेमानी कर दी"

"उसकी राह के काँटे चुन लिए अपने दामन में,
आबाद कलियों से उसके घर की हर गली कर दी,
आँसू कर लिए जज़्ब हमने अपने सीने में,
और लबो पर मुस्कान की एक झूठी कहानी कर दी"

"वो बेवफा खुश थी हमे इस कदर गम देकर,
एक इशारे पर जिसके निसार ये जवानी कर दी,
नज़रे इनायत के बदले मिली बेरूख़ी हमको अक्स,
यूँ उम्र भर तड़पने की दौलत हमारे नाम कर दी"

"अक्स"

Monday, April 30, 2012

मिलन

"ना बिताए जाते हैं मुझ पर ये पल,
जो तेरे मिलन की आस जगाते हैं,
नींद आँखों से कोसो दूर है मेरी,
अब खुली आँखों में सपने झिलमिलाते हैं"

"एक एक पल लगता है एक बरस के समान,
क्यूँ ये दो दिलों की दूरियाँ बढ़ाते हैं,
मिलन को दिल बेताब मेरा भी है और तेरा भी,
फिर क्यूँ ये रस्मो रिवाज़ बीच में अड़ जाते हैं"

"वो दिन दूर नही जब होगा तेरा हाथ मेरे हाथो में,
जिसका सपना कब से हम सजाते हैं,
दो जिस्म एक जान कहते हैं लोग हमको,
फिर क्यूँ हमारे दिल की धड़कन ना समझ पाते हैं"

फिर भी अनमोल हैं मुझको ये पल,
जो तेरे मिलन की आस जगाते हैं"

"अक्स

Tuesday, March 27, 2012

अंजान

"जान बूझकर अंजान बना जाता है कोई,
हमारे दिल पर लाखो तीर चलाता है कोई,
छलनी हुए दिल से लहू टपकता तो क्या बात थी,
जख़्मो से बहते प्यार को ठुकरा कर चला जाता है कोई"

"निगाहों की एक जुम्बिश से हमे कत्ल पर डाला,
फिर हमी पर कातिल होने का इल्ज़ाम लगाता है कोई,
दामन ना उसका दागदार हो, हमने होठों को सिल लिया,
पर क्या करें, जब खुद ही बदन उघाड़े चला जाता है कोई"

"आज इस माहौल में क्या किसी का हो ऐतबार,
जहाँ परछाईं को भी ठग कर चला जाता है कोई,
उठा कर हाथ तुझसे अब क्या मांगू मैं या रब,
बिन माँगे ही मुझको सब कुछ दिए जाता है कोई"

"अक्स"

Monday, January 30, 2012

वादी-ए-गुलिस्ता

"वादी-ए-गुलिस्ता से किसी ने प्यार भेजा है,
कभी हम जो खो बैठे, चैन ओ करार भेजा है,
उन दो लबो का थरथराना, अब भी मुझको याद है,
फिर आज उसी मुस्कान को काग़ज़ पे उतार भेजा है"

"खत में भरा है प्यार पर, शब्दो में है नाराज़गी,
फिर भी हर एक शब्द पर, हमे वार प्यार भेजा है,
हाल-ए-तमाम ना कह सके, जो बहते आंसूओ के संग,
बयाँ वो मुझसे करने को सूखा गुलाब भेजा है"

"स्याही जो ख़त्म हुई तो, दिया आंसूओ को रंग,
कत्ल हमे करने को, कजरे का वार भेजा है,
उस नाज्ञीन का शुक्रिया, हमको किया है याद जो,
नाशुक्रा कहकर ही सही, दिल का उपहार भेजा है"

"अक्स"

Monday, January 2, 2012

देश का दर्द

"चल जाग मुसाफिर होश में आ,
किस बात से तू यूँ डरता है,
जो देश बनाया तेरे अपनो ने,
उसमे क्यूँ घुट घुट मरता है"

"देख हाल सुनाऊं मैं तुझको,
जो अब तक हम पर बीती है,
एक आग में कब से झुलस रहा,
गंदी यहाँ अब हर एक नीति है"

"कहीं चोरी, सीना ज़ोरी है,
कहीं जेब पे तेरी डाका है,
तू मेहनतकश सबके पेट भरे,
घर फिर भी तेरे फाका है"

"कहीं चोर छुपा है चद्दर में,
कहीं चोर ही खद्दर धारी है,
जिस एक को चुन भेजा लाखो ने,
क्यूँ वो एक ही लाखों पे भारी है"

"प्रतीक है जो देश की गरिमा का,
दंगा उसमे अब यहाँ चलता है,
अपने तो भूख से बिलख, तड़प रहे,
और आतंकी बिरयानी पर पलता है"

"दिन में एक ओर जहाँ जूतम पैजार दिखती है,
फिर रात को भरी मस्ती में कोई भंवरी देवी लुटती है,
छोड़ अनाज को लोग यहाँ अब इंसान को ही खाते हैं,
तोड़ ग़रीबों का छप्पर ताज महल बनवाते हैं"

"नाम पे कोरी भैंसो के चारा कोई इंसान ख़ाता है,
बेच कोई स्पेक्ट्रम को बैंक बैलेंस बढ्वाता है,
इटों रेता के बिना कोई एक पूरा गाँव बनाता है,
कोई खुद के जीते जी ही पत्थर में घढ़वाता है"

"कहीं हाथी कुचले है सबको,
कहीं पंजा मार निशान रहा,
कभी कमल फूल हमे दाबे है,
कहीं कुचल साइकल हमारा संविधान रहा"

"अब जाग ज़रा और बाँध कमर,
अगर देश को फिर से पाना है,
बना हर एक को पाँच पांडव सा,
अगर कौरव को मार भगाना है"

"अक्स"

Monday, December 26, 2011

कुहासा भरी सड़क

"कुहासा भरी सड़क के एक किनारे से निकलती वो,
धुएँ में लिपटी कोई तस्वीर नज़र आती है,
ठंड की कंपकंपाहट से लरजते वो होठ उसके,
मानो कोई तितली पंख फड़फडाए चली आती है"

"हवा के संग बहते शॉल को यूँ लपेटती वो,
ज्यूँ चंदन व्रक्ष से सर्पिणी लिपटती जाती है,
पाले की सर्द बूँदो की ठिठुरन से सहरती हुई,
काँपती पलकों से कुहासे को चीरती जाती है"

"बहती हवा से आगे बढ़ने की जद्दोजहद करती वो,
लगता आज मन में कुछ करने की ठानी है,
सर्द कुहासा गहरा है या उसकी झील सी आँखें,
वो अजंता की मूरत मेरे दिल में उतरती जाती है"

"अक्स"

Wednesday, July 6, 2011

हौंसला

"ज़िंदगी के रंग भी कितने अज़ीब होते हैं,
अपने दूर रहकर भी करीब होते हैं,
उड़ा ले जाती है आँधी बड़े बड़े दरखतो को,
ठहर वो ही पाते हैं जो ज़मीन के करीब होते हैं"

"यूँ तो वार करते रहने से पत्थर भी टूट जाते हैं,
सहन करने का हुनर तो बस इंसान को ही आता है,
अरे सीखना है कुछ तो उन दरखतो से सीखो,
जो अपने कलेजे के टुकड़े भी तुम पर वार जाते हैं"

"खुशी तो कभी गम के रंग देख कर रोते क्यूँ हो,
ज़िंदगी में दिन ऑर रात भी इनके निशान होते हैं.,
मुक़र्रर वक़्त पे मुक़द्दर तेरा चमकेगा अक्स,
हौसलें रखने वालो के ही सपनो के मुकाम होते हैं"

"अक्स"