Thursday, June 3, 2021

क्या लिखूं

"खैर ओ गुरबत के इस मसौदे का हल नही मिलता,

तिरा नज़र डालूं ,   बस कयामत नज़र आती है,

ज़ियारत सा भरा रहता था जो हर एक चौबारा,

नाचारों का वहां अब एक गट्ठर नज़र आता है"


 "इस जहां की खुशियों को दीमक लग गयी है शायद

हर ओर बेकशी और बेबसी का मंजर नज़र आता है,

सुकून ए दिल की तलाश में भटक रहा हर कोई,

खुद के कांधो पर खुद की, न’अश लिए जाता है"


 त्राहि माम त्राहि माम सुनाई पड़ता है हर ओर,

न नौनिहाल कोई अब  खिलखिलाता नज़र आता है,

कितनो के अपने बिछड़ गए, इस ख़ता ग़ुबार में,

हर घर के आगे अब एक शमशान नज़र आता है"


 "निज़ाम की पेशानी पे फ़क़त नही कोई शिकन,

उसकी अदब अन्जुमन की यही तो निशानी है,

अत्तफ़ाल कितने अफ़सुर्दा किसको है क्या खबर,

इनके लिए लहू भी अब आब-ए-तल्ख़ मानी है"


 "सूखे पड़े हैं आबे ए चश्म, क्या आरज़ू करें,

 तिरा काज़ी के हाथों कत्ल की साज़िश नज़र आती है,

काइल कुबूलनामा उन्होंने कायदों में नही पढ़ा लिखा,

ख़ज़ां में बस ख़ुदी का जो ख़ुमार चढ़ा जाता है"

"आशुफ़्ता है सारी प्रजा, न इज़्तिराब से कोई निजात,

इन्तिज़ाम में, इन्तिख़ाब के, उफ़्ताद को दावत दे डाली है,

ख्व़ाहिश हुई न पूरी जाहिल की , रहा लब्बो लुबाब निल

ग़़फलत में गुरूर करना,  बस जाहिलों को ही आता है"


"मैं क्या लिखूं , क्या ना लिखूं, है जुस्तजू यही,

आमद में खुशियां लिख दे, गर तुझे आता है ???"

'अक्स'

Tuesday, December 29, 2020

एक राजमार्ग की अभिलाषा

"चाह नही, मैं अपनो के 

दंगो में तोड़ा जाऊं,


चाह नही, आंदोलनो में

लोगो का सिरहाना बन जाऊं,


चाह नही, देखूं मीलों,

बच्चों, बूढ़ों को पैदल चलते,


चाह नही, देखूं मैं दौड़ती,

गाड़ियों को आपस में भिड़ते,


एक तमन्ना है बस,

अच्छे से बनाया जाऊं,


दौड़ें जिस पर गाड़ी सरपट,

लोगों को घर पहुँचा पाऊँ"


'अक्स'

Thursday, October 1, 2020

गुदड़ी का लाल

"गुदड़ी का लाल था वो, मुगल सराय से आया,

एक कमाल था जो, मर कर भी मर ना पाया,

घर में था सबसे छोटा, नन्हे थे सब बुलाते,

फिर भी बड़ा बना वो, सबका था मान बढ़ाया"


"ली शास्त्री की उपाधि, जब उसने काशी से,

परचम फिर अपने नाम का, जग में फहराया,

मरो नहीं, मारो का नारा, था दिया देश को,

नाकों चने था फिर उसने अंग्रेज़ो को चबवाया"


"मिली जब आज़ादी तो देश हुआ एकजुट,

गुदड़ी के लाल को सबने, सर माथे पर बिठाया,

पैंसठ के युद्ध में जब,  सब होश खो रहे थे,

जय जवान-जय किसान नारे से जोश था जगाया"


"पहुँचा जब ताशकंद, थर थर थे काँपे दुश्मन,

जुड़ा था जमीं से पर, आसमाँ को भी झुकाया,

सारी उम्र रहा वो, एक संघर्ष का मसीहा,

सादा जीवन उच्च विचार को साकार कर दिखाया"


'अक्स' 

Sunday, September 13, 2020

नारी शक्ति

"माँ, बहन, बीवी और बेटी, जाने कितने किरदार निभाती है,

नारी के ही बस में है, हर गम सहकर मुस्कुराती है,

देती है जहाँ अनगिनत कुर्बानियाँ, अपनो की खातिर,

वहीं रणचंडी बन, दुश्मन का लहू भी पी जाती है"


"घर के अंदर हो या बाहर, चलती है मिलाकर कंधे से कंधा,

अपने शौर्य और कारनामो से सबको चकित कर जाती है,

घर की रसोई या जंग का मैदान, सब बराबर उसके लिए,

यहाँ दिल में उतरे , वहाँ दुश्मन के सीने पर चढ़ जाती है"


"ना जाने अभी ओर कितने कीर्तिमान गढ़ने हैं उसको,

हर कदम नयी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है,

ज़िंदगी की हर चुनौती को हराने का माद्दा लिए,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है"


'अक्स'


Friday, October 18, 2019

करवा चौथ

"कुछ इस तरह से इश्क़ की किश्तें भर रहा हूँ,
हर करवाचौथ पर अब मैं व्रत कर रहा हूँ,
बीवी है बैठी खाये, काजू, बादाम , पिस्ता,
और मैं तो चाय तक को भी तरस रहा हूँ "

"है चाँद भी अब दुश्मन, खिड़की से भी न झांके,
पाने को जिसके दर्शन, छलनी लिए खड़ा हूँ,
कृपा है श्रीमती जी की, जो साथ में खड़ी हैं,
वरना तो लेकर आसन पाटी, कब से वो पड़ी हैं"

"साल का ये एक दिन, है बड़ा गज़ब जी
बनने की आज शेर, हर एक चूहे को पड़ी है,
कहते हैं मियां अक्स, मत अतीत को तुम भूलो,
सामने फिर कल से, वही पुरानी शेरनी खड़ी है"

'अक्स,

Monday, May 13, 2019

अकेलापन

"आज मैं  फिर अकेला रह गया हूँ,
मेरे अपने कहीं पीछे छूट गए,
वो मां की लोरी, पापा की झिड़की
मिट्टी का खिलौना, लकड़ी की गाड़ी,
सब सहेज कर रखे थे एक गुल्लक में,
जिसे नादान दुनिया वाले लूट गए
आज मैं फिर अकेला रह गया हूँ"

"कैसे बताऊं उसमें क्या क्या था संजोया,
वो दादा दादी की मनुहार, जब भी मैं रोया,
चारपाई का झूला वो झंडियों का रेला,
पिट्ठू का खेला वो राम जी का मेला,
करता था जिसमें हुल्लड़, मैं संग दोस्तों के,
गायों की दौड़ से उठता गोधूली का रेला,
उसे भूल सड़को की रैली में खो गया हूँ,
आज मैं फिर अकेला रह  गया हूँ"

" ताऊ चाचा का प्यार, गांव वालों का दुलार,
मेरी बस एक जिद पे सबका विचलित होना,
कागज की नाव या साइकल की होती थी दौड़,
हार कर भी सभी के संग खुशी में शामिल होना,
नापना फलांगो में मोहल्लो की बारादरी,
फिर मार के डर से, चुपके से घर में आना
अब घर छोड़ कर मैं मकान में रह गया हूँ,
आज फिर मैं अकेला रह गया हूँ"
"अक्स”

Monday, March 18, 2019

सुख चैन


"सुख चैन कहाँ वो नींद कहाँ,
जो दादा के संग मैं पाता था,
दादी की गोद में सर रख कर,
जब सपनो में उड़ जाता था"

"वो खेल खिलौने मिट्टी के,
यारों संग करना वो हुल्लड़,
जब मार कुलाँचे पेड़ो पर,
बस दम भर में चढ़ जाता था"

"जब फसल लहलहाती खेतो में,
तन मन को खुश कर जाती थी,
फिर शाम भरे चौपालो में ,
शुभ मंगल गान मैं गाता था"

"वो गिनकर रातों को तारे,
चारपाई पर उधम मचाता था,
फिर पापा की गुर्राहट से डरकर,
दादा के पीछे छुप जाता था"

"पौं फटे वो सुनना चिड़ियों का कलरव,
 बड़े बुज़ुर्गो को झुककर शीश नवाता था,
 जब खाड़िया पुती स्लेटों को झोले में लेकर जाते थे,
 शहतूत की बेंत के आगे सब भीगी बिल्ली बन जाते थे'
 

"वो सौंधी सौंधी सी यादें,
अब भी जीवन को महकाती हैं,
छुना चाहूं उनको जो हाथ बढ़ा,
बस पलकों को नम कर जाती हैं"

'अक्स'