Monday, June 14, 2021

ख्वाहिश

 "ख़ुश्क, खस्ता हाल है आज हर ज़मीर,

ख्वाहिशों से लबालब, इंसां नज़र आता है,

खास ओ आम में फ़र्क़, अब मुमकिन ही नहीं,

ग़ुम ग़ज़िदा अब, हर बेकरार नज़र आता है"


"गुमगश्ता ज़िन्दगी है, अब इन राहों में कहीं,

गर्दिशों में फंसा, हर नादाँ नज़र आता है,

अस्हाब मान बैठे हैं खुद को, कुछ जर खरीद गुलाम,

अफ़सुर्दा अलीम भी अब, अपने इल्म को रोता है"


"इफ़्रात की बीमारी, खा जाती है फ़ज़ल को,

इनाद का एक पौधा, पनपता नज़र आता है,

इबादत की नही इबारत, इस जहां में ओर कोई,

ख़िदमत हो गर इंसां की, बस नूर बरस जाता है"


"बे ज़ार, बे कस, बे खुद ,है ये पासबान चमन का,

बेक़ल जिसकी फ़िक्र में, हर गुल नज़र आता है,

समझे है खुद को कातिब, इस बज़्म में हर कोई, 

मुग़ालते में इश्क़ के, 'अक्स' बर्बाद हुआ जाता है"

'अक्स'

Wednesday, June 9, 2021

अल्फ़ाज़

 "कुछ यूं उधड़े अल्फ़ाज़ सिल लिए मैंने,

डोर कच्ची थी मगर काम आ गयी,

ज़हमत जो उठाई , कभी कुछ कहने की,

वो तबस्सुम मेरे लफ़्ज़ों पे छा गयी"


"तर्जुमान को भी खोजा, कहीं मिल जाये,

सुर्ख लबों की ये चुन्नटें अब खुल जाएं,

तसल्ली न मिली, तारिक मिलता गया,

तिशनगी उस नाआशना की, जेहन पे छा गयी"


"दानिश भी परेशां हैं, मेरे हाल को लेकर,

फ़ितरत मेरे मर्ज़ की , कुछ यूं गुमा गयी,

रोग है फुराक़ का या फ़ुवाद का ए 'अक्स',

इब्तिला थी मेरी, पर सबको रुला गयी"

'अक्स'

Tuesday, June 8, 2021

तलाश -2

 "मेरी नाशाद ख्वाहिशों को नवाज़िश की तलाश है , 

नाचीज़ को जो समझे , उस निगाह की तलाश है,  

फिरता हूँ दर ब दर , किसी फ़क़ीर की तरह,

इस रूह ए नामुराद को, नबी की तलाश है ।"


"अर्ज़मन्द यहां कौन है, जरा सामने तो आये, 

नाशुकरौ की इस अन्जुमन में, तसरीफ तो लाये,

बैठे हैं  दिल थाम के , सब जिसकी आमद में,

उसको भी इस जहां में आदिल की तलाश है"


"इश्राक की एक किरण आ जाए कहीं से,

अन्ज को जाने कब से अब्र की प्यास है,

अल्फ़ाज़ गिर गये गले में, तालू से फिसल कर,

अब्सार  को जमाने से नमी की तलाश है"


"आलिम की आवाज़ यहां अब सुनता नही कोई,

अब सब को आब ए आईना में, जन्नत की आस है,

स्वीकार कर सके गर, कर लेना तू भी 'अक्स'

ख़ुदी के साथ रहकर भी, तुझे खुद की तलाश है"

'अक्स'

Thursday, June 3, 2021

क्या लिखूं

"खैर ओ गुरबत के इस मसौदे का हल नही मिलता,

तिरा नज़र डालूं ,   बस कयामत नज़र आती है,

ज़ियारत सा भरा रहता था जो हर एक चौबारा,

नाचारों का वहां अब एक गट्ठर नज़र आता है"


 "इस जहां की खुशियों को दीमक लग गयी है शायद

हर ओर बेकशी और बेबसी का मंजर नज़र आता है,

सुकून ए दिल की तलाश में भटक रहा हर कोई,

खुद के कांधो पर खुद की, न’अश लिए जाता है"


 त्राहि माम त्राहि माम सुनाई पड़ता है हर ओर,

न नौनिहाल कोई अब  खिलखिलाता नज़र आता है,

कितनो के अपने बिछड़ गए, इस ख़ता ग़ुबार में,

हर घर के आगे अब एक शमशान नज़र आता है"


 "निज़ाम की पेशानी पे फ़क़त नही कोई शिकन,

उसकी अदब अन्जुमन की यही तो निशानी है,

अत्तफ़ाल कितने अफ़सुर्दा किसको है क्या खबर,

इनके लिए लहू भी अब आब-ए-तल्ख़ मानी है"


 "सूखे पड़े हैं आबे ए चश्म, क्या आरज़ू करें,

 तिरा काज़ी के हाथों कत्ल की साज़िश नज़र आती है,

काइल कुबूलनामा उन्होंने कायदों में नही पढ़ा लिखा,

ख़ज़ां में बस ख़ुदी का जो ख़ुमार चढ़ा जाता है"

"आशुफ़्ता है सारी प्रजा, न इज़्तिराब से कोई निजात,

इन्तिज़ाम में, इन्तिख़ाब के, उफ़्ताद को दावत दे डाली है,

ख्व़ाहिश हुई न पूरी जाहिल की , रहा लब्बो लुबाब निल

ग़़फलत में गुरूर करना,  बस जाहिलों को ही आता है"


"मैं क्या लिखूं , क्या ना लिखूं, है जुस्तजू यही,

आमद में खुशियां लिख दे, गर तुझे आता है ???"

'अक्स'

Tuesday, December 29, 2020

एक राजमार्ग की अभिलाषा

"चाह नही, मैं अपनो के 

दंगो में तोड़ा जाऊं,


चाह नही, आंदोलनो में

लोगो का सिरहाना बन जाऊं,


चाह नही, देखूं मीलों,

बच्चों, बूढ़ों को पैदल चलते,


चाह नही, देखूं मैं दौड़ती,

गाड़ियों को आपस में भिड़ते,


एक तमन्ना है बस,

अच्छे से बनाया जाऊं,


दौड़ें जिस पर गाड़ी सरपट,

लोगों को घर पहुँचा पाऊँ"


'अक्स'

Thursday, October 1, 2020

गुदड़ी का लाल

"गुदड़ी का लाल था वो, मुगल सराय से आया,

एक कमाल था जो, मर कर भी मर ना पाया,

घर में था सबसे छोटा, नन्हे थे सब बुलाते,

फिर भी बड़ा बना वो, सबका था मान बढ़ाया"


"ली शास्त्री की उपाधि, जब उसने काशी से,

परचम फिर अपने नाम का, जग में फहराया,

मरो नहीं, मारो का नारा, था दिया देश को,

नाकों चने था फिर उसने अंग्रेज़ो को चबवाया"


"मिली जब आज़ादी तो देश हुआ एकजुट,

गुदड़ी के लाल को सबने, सर माथे पर बिठाया,

पैंसठ के युद्ध में जब,  सब होश खो रहे थे,

जय जवान-जय किसान नारे से जोश था जगाया"


"पहुँचा जब ताशकंद, थर थर थे काँपे दुश्मन,

जुड़ा था जमीं से पर, आसमाँ को भी झुकाया,

सारी उम्र रहा वो, एक संघर्ष का मसीहा,

सादा जीवन उच्च विचार को साकार कर दिखाया"


'अक्स' 

Sunday, September 13, 2020

नारी शक्ति

"माँ, बहन, बीवी और बेटी, जाने कितने किरदार निभाती है,

नारी के ही बस में है, हर गम सहकर मुस्कुराती है,

देती है जहाँ अनगिनत कुर्बानियाँ, अपनो की खातिर,

वहीं रणचंडी बन, दुश्मन का लहू भी पी जाती है"


"घर के अंदर हो या बाहर, चलती है मिलाकर कंधे से कंधा,

अपने शौर्य और कारनामो से सबको चकित कर जाती है,

घर की रसोई या जंग का मैदान, सब बराबर उसके लिए,

यहाँ दिल में उतरे , वहाँ दुश्मन के सीने पर चढ़ जाती है"


"ना जाने अभी ओर कितने कीर्तिमान गढ़ने हैं उसको,

हर कदम नयी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ती जाती है,

ज़िंदगी की हर चुनौती को हराने का माद्दा लिए,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है,

सबको साथ लेकर आगे बढ़ना, बस नारी ही कर पाती है"


'अक्स'