Monday, January 30, 2012

वादी-ए-गुलिस्ता

"वादी-ए-गुलिस्ता से किसी ने प्यार भेजा है,
कभी हम जो खो बैठे, चैन ओ करार भेजा है,
उन दो लबो का थरथराना, अब भी मुझको याद है,
फिर आज उसी मुस्कान को काग़ज़ पे उतार भेजा है"

"खत में भरा है प्यार पर, शब्दो में है नाराज़गी,
फिर भी हर एक शब्द पर, हमे वार प्यार भेजा है,
हाल-ए-तमाम ना कह सके, जो बहते आंसूओ के संग,
बयाँ वो मुझसे करने को सूखा गुलाब भेजा है"

"स्याही जो ख़त्म हुई तो, दिया आंसूओ को रंग,
कत्ल हमे करने को, कजरे का वार भेजा है,
उस नाज्ञीन का शुक्रिया, हमको किया है याद जो,
नाशुक्रा कहकर ही सही, दिल का उपहार भेजा है"

"अक्स"

Monday, January 2, 2012

देश का दर्द

"चल जाग मुसाफिर होश में आ,
किस बात से तू यूँ डरता है,
जो देश बनाया तेरे अपनो ने,
उसमे क्यूँ घुट घुट मरता है"

"देख हाल सुनाऊं मैं तुझको,
जो अब तक हम पर बीती है,
एक आग में कब से झुलस रहा,
गंदी यहाँ अब हर एक नीति है"

"कहीं चोरी, सीना ज़ोरी है,
कहीं जेब पे तेरी डाका है,
तू मेहनतकश सबके पेट भरे,
घर फिर भी तेरे फाका है"

"कहीं चोर छुपा है चद्दर में,
कहीं चोर ही खद्दर धारी है,
जिस एक को चुन भेजा लाखो ने,
क्यूँ वो एक ही लाखों पे भारी है"

"प्रतीक है जो देश की गरिमा का,
दंगा उसमे अब यहाँ चलता है,
अपने तो भूख से बिलख, तड़प रहे,
और आतंकी बिरयानी पर पलता है"

"दिन में एक ओर जहाँ जूतम पैजार दिखती है,
फिर रात को भरी मस्ती में कोई भंवरी देवी लुटती है,
छोड़ अनाज को लोग यहाँ अब इंसान को ही खाते हैं,
तोड़ ग़रीबों का छप्पर ताज महल बनवाते हैं"

"नाम पे कोरी भैंसो के चारा कोई इंसान ख़ाता है,
बेच कोई स्पेक्ट्रम को बैंक बैलेंस बढ्वाता है,
इटों रेता के बिना कोई एक पूरा गाँव बनाता है,
कोई खुद के जीते जी ही पत्थर में घढ़वाता है"

"कहीं हाथी कुचले है सबको,
कहीं पंजा मार निशान रहा,
कभी कमल फूल हमे दाबे है,
कहीं कुचल साइकल हमारा संविधान रहा"

"अब जाग ज़रा और बाँध कमर,
अगर देश को फिर से पाना है,
बना हर एक को पाँच पांडव सा,
अगर कौरव को मार भगाना है"

"अक्स"

Monday, December 26, 2011

कुहासा भरी सड़क

"कुहासा भरी सड़क के एक किनारे से निकलती वो,
धुएँ में लिपटी कोई तस्वीर नज़र आती है,
ठंड की कंपकंपाहट से लरजते वो होठ उसके,
मानो कोई तितली पंख फड़फडाए चली आती है"

"हवा के संग बहते शॉल को यूँ लपेटती वो,
ज्यूँ चंदन व्रक्ष से सर्पिणी लिपटती जाती है,
पाले की सर्द बूँदो की ठिठुरन से सहरती हुई,
काँपती पलकों से कुहासे को चीरती जाती है"

"बहती हवा से आगे बढ़ने की जद्दोजहद करती वो,
लगता आज मन में कुछ करने की ठानी है,
सर्द कुहासा गहरा है या उसकी झील सी आँखें,
वो अजंता की मूरत मेरे दिल में उतरती जाती है"

"अक्स"

Friday, October 28, 2011

आज का आदमी

"चारो तरफ हो रहा ये कैसा अत्याचार है,
आदमी ही आदमी को खाने को तैयार है,
पैसे कि वो भूख उसकी बढ़ रही दिन ब दिन,
पैसे के लिए कुछ भी वो करने को तैयार है"

"भाई का गला काट, बाप को भौंका छुरा,
माँ के दूध को उसी के खून में दिया मिला,
हंसते खेलते घर को जला के खाक कर दिया,
जान बूझ कर ये खुद का ही कर रहा संहार है"

"जानवर को पाल कर खुद आदमख़ोर बन रहा,
जानवर खुद आज आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है,
माँग सूनी हो रही कहीं लाल माँ के लुट रहे,
कुचला हुआ समाज डर से कर रहा चीत्कार है"

"चारो तरफ हो रहा ये कैसा अत्याचार है,
आदमी ही आदमी को खाने को तैयार है"

"अक्स"

Monday, October 17, 2011

राजनीति

"किसी ने मुझसे पूछा राजनीति क्या है,
मैने कहा बंधुवर, राजनीति एक अजब बुखार है,
जिसको चढ़ जाए उसका तो समझो बेड़ा पार है,
हो जाए मगर जो ओवर डोज तो फिर बँटा धार है"

"राजनीति वो मैली सी बहती हुई गंगा है,
जिसमे हर एक कभी ना कभी हुआ नंगा है,
अपने नंगे पन को छिपाने की नाकाम कोशिश में,
दूसरे की अधखुली धोती को फाड़ने का पलटवार है'

"राजनीति एक डुगडुगी वाला खिलौना है,
चाहे किसी के हाथ हो, आम जनता को बस रोना है,
आटा,दाळ,चीनी सब चढ़ते जा रहे इसकी भेंट,
लगता है ये सुरसा का एक कलयुगी अवतार है"

"राजनीति चोरों और नेताओं के लिए संजीवनी है,
इसके सहारे इनको बस अपनी जमात ही जीमनी है,
जिसके बल पर हर एक की जेब हो रही भारी,
राजनीति इनका वो ही अचूक हथियार है"

"मगर मेरे दोस्त मुझे बस इस बात का दुख है,
क्यूँ मेरा देश इस रोग का शिकार है,
क्यूँ मेरा देश इस रोग का एक शिकार है"

"अक्स"

Thursday, October 13, 2011

माँ

"हिम सी शीतलता लिए,
तेज सूरज सा धरे,
उसके आँचल के समक्ष,
ब्रहमांड भी छोटा पड़े"

"है दुर्गा का एक रूप वो,
और गंगा से भी कोमल है,
उसके चरणो के तले,
हर दीप ज्ञान का जले"

"कर सकती है उत्पत्ति वो,
तो नाश की भी शक्ति धरे,
वात्सल्य की है एक ख़ान वो,
दूध में जिसके अमृत बहे"

"सब देवों में है उच्च वो,
चाहे जहाँ ओर जो रूप धरे,
सत सत नमन है तुझको माँ
कितना ओर मैं तेरा गुणगान करूँ"

"बस एक तेरी वंदना के लिए ,
आज तक कोई शब्द नही बने"

"अक्स"

Friday, September 30, 2011

खामोशी

"ज़रा मिलकर तुम उनकी ये गफलत दूर कर देना,
मेरी खामोशियों को जो,मेरी कमज़ोरी समझते हैं,
तमन्ना हम भी रखते हैं वफ़ा में जान देने की,
ना जाने क्यूँ कर वो हम को,बेगाना समझते हैं,

"दरारें दिल में पड़ती हैं,जिस्म छलनी सा होता है,
हमारे सामने जब इश्क़ की कोई मय्यत निकलती है,
सभी के दिल में बसने की एक हम ही में कुव्वत है,
इस शहर में ना जाने क्यूँ सभी पत्थर दिल निकलते हैं"

"मचलते दरियाँ से हम हैं,यूँ ही लौटा नही करते,
मगर उस चौखट से हम भी ज़रा बचकर निकलते हैं,
अकड़ कर कोई भी हमसे,कभी हमे झुका नही सकता,
मगर बस प्यार के बदले हम राहों में बिछ पड़ते हैं"

"अक्स"