"चारो तरफ हो रहा ये कैसा अत्याचार है,
आदमी ही आदमी को खाने को तैयार है,
पैसे कि वो भूख उसकी बढ़ रही दिन ब दिन,
पैसे के लिए कुछ भी वो करने को तैयार है"
"भाई का गला काट, बाप को भौंका छुरा,
माँ के दूध को उसी के खून में दिया मिला,
हंसते खेलते घर को जला के खाक कर दिया,
जान बूझ कर ये खुद का ही कर रहा संहार है"
"जानवर को पाल कर खुद आदमख़ोर बन रहा,
जानवर खुद आज आदमी से ज़्यादा वफ़ादार है,
माँग सूनी हो रही कहीं लाल माँ के लुट रहे,
कुचला हुआ समाज डर से कर रहा चीत्कार है"
"चारो तरफ हो रहा ये कैसा अत्याचार है,
आदमी ही आदमी को खाने को तैयार है"
"अक्स"
Showing posts with label अत्याचार. Show all posts
Showing posts with label अत्याचार. Show all posts
Friday, October 28, 2011
Subscribe to:
Posts (Atom)