Wednesday, October 20, 2010

झूठा बंधन

"दर्द ए दिल अपना उनसे छुपाया न गया,
भूलना जो चाहा तो भुलाया न गया,
उसकी खातिर ठुकरा घर हम बन गए मजनू,
उस बेवफा से लैला का नाम तक अपनाया न गया"

"दावा करते थे मुहब्बत में जान देने का,
दौलत का वो झूठा बंधन तो ठुकराया न गया,
आह भरते रहे हम जख्म खाते रहे उसके लिए,
एक रेशा मरहम तक उस पर लगाया न गया"

"हम चीखते रहे उसके लिए सीना चीर फेंका,
हमारा नाम तक उससे लबो पे लाया न गया,
ये मेरी जिद थी की मैं बनाऊंगा उसको अपना 'अक्स'
जन्नत बसाने निकला था, एक गुलिस्ता तो बसाया न गया"

"अक्स"

Monday, September 27, 2010

हिन्दी

"जो सबके मन को हर्षाती,
दिल को दिल से जो जुड़वाती,
हिन्दी ही है एक वो भाषा,
जो शहर प्रांत का भेद मिटाती"

"हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई,
सबके मुख पर ये चढ़ जाती,
एक दूजे के लिए बढ़ा प्रेम ये,
सबको प्रेम का पाठ पढ़ाती"

"सबके दिल में बसती है ये,
राजभाषा हिन्दी सबका आदर पाती,
प्रांत को प्रांत ओर देश को दिल से,
जोड़ हिन्दी देश का मुकुट कहलाती"

"अक्स"

Tuesday, September 21, 2010

सवाल

"तेरी बेवफ़ाई के गम से भरा दिल,
ना जाने तेरे लिए बेकरार क्यूँ है,
मुझे तुझसे नफ़रत है या फिर मुहब्बत,
ज़िंदगी इन सवालो से परेशान क्यूँ है"

"वो तेरे ज़िंदगी भर साथ निभाने के वादे,
मेरी मंज़िल तेरी रहो से गुमनाम क्यूँ है,
कभी मेरी ज़िंदगी में नूर बरसाती तेरी आँखें,
उजाला आज मेरी चौखट से नाराज़ क्यूँ है"

" वो तेरी कोयल सी मीठी बोली,
मेरा आँगन आज उन गीतो से अंजान क्यूँ है,
जो कभी हमारे दिल में रहती थी धड़कन बनकर,
दिल आज उसी धड़कन से वीरान क्यूँ है"

"अक्स"

Friday, September 17, 2010

स्वप्न

"जाने क्यूँ मेरे दिल की धड़कन,
तेरी एक आहट से रुक जाती है,
हवा में फैली तेरे बदन की सौंधी खुश्बू,
मेरे अंतर्मन को भी महका जाती है"

"मोती से चमकते तेरे नैनो की चपलता,
मृग को भी एकबारगी भ्रमित कर जाती है,
पलको का आवरण कुछ यूँ लगे है इन पर,
ज्यों गोरी लाज से घूँघट में सिमट जाती है"

"ठगा सा खड़ा रह जाता हूँ मैं बस,
ज्यों कोई नागिन बीन से बंध जाती है,
तेरे सम्मोहन में फँसता जाता हूँ बस,
तुझमे ही मुझे मेरी दुनिया नज़र आती है"

"अक्स"

Tuesday, July 20, 2010

चितचोर

"वो बहकी सी मदहोश निगाहें,
मानो मय का सागर छलका रही हैं,
हर कोई पागल हो चल पड़ा उनके पीछे,
वो फिर भी अपना जाल फैला रही है"

"भरी हिरनी सी चंचल चपलता उनमे,
सूरज सा चमक एक तेज बिखेर रही हैं,
पलकों की ओट से शीतल चाँदनी फैलातीं वो ,
जाने किस गुमान में उड़ी जा रही हैं"

"जग में फैला रहीं एक भ्रम जाल वो,
मस्ती में बस झूम रही हैं,
बन तेज़ कटारी उतर पड़ी हर दिल में,
जग के सब बंधन काट रही हैं"

"अक्स"

Sunday, July 11, 2010

हया

"उनकी पलकों पर फैली वो मद्धम सी हया,
जाने क्यूँ मेरे दिल में उतर जाती है,
उनकी निगाहों में उभरती हुई एक लकीर,
मानो मेरे होने पर ही एक सवाल उठाती है"

"वो मुस्कुराती है होले से कुछ इस तरह,
जैसे रात में तारो संग चांदनी फ़ैल जाती है,
लब थिरकते रहते हैं पर न कुछ बोलती वो,
बिन कुछ कहे भी जाने कैसे सब कह जाती है"

"तडपाती है मुझे जाने क्यूँ उन अदाओ से,
फिर एक तिरछी नज़र से घायल कर जाती है,
बड़ी अजीब है ये उसकी क़त्ल करने की अदा अक्स,
जिसको वो अपनी हया के पहलू में छुपा जाती है"

"अक्स"

Tuesday, June 29, 2010

सहर

"उन आँखों में फैली एक गहरी उदासी,
आज उस घनी झील में एक तूफ़ान सा है,
जिनमे बहते थे हम कभी मस्ती से भरे,
उन्ही लहरों पे फैला आज कोई जाल सा है"

"कभी मस्ती छलकाते वो दो रस के प्याले,
मय के लिए जिनकी आज रिंद तरसता सा है,
क्यूँ गुम गए हैं यूँ ही एक स्याह अँधेरे में,
सागर में जिनकी बेबसी के सूरज भी जुगनू सा है"

"खेला करते थे जहाँ सपने उस एक जहाँ में,
वो आज गम के अंधेरो से वीरान सा है,
तमन्ना है अक्स मेरी अंतिम फिर वहां सहर की,
पर मेरा निगेहबान तो मुझसे भी रूठा सा है"