Tuesday, July 5, 2022

कशमकश

 'हिन्दू हूँ मैं या एक मुसलमान हूँ मैं,

अजब कशमकश है, क्या इंसान हूँ मैं,

किये मंदिर के फेरे और नमाज़ ए मस्जिद भी,

हूँ गीता का श्लोक या आयत ए कुरान हूँ मैं'


'फूलों में खेला कभी लिपटा हूँ चादरों में,

'बन कर तदबी का धागा, बंधा कलाइयों में,

नवरात्र में भजन गाये, रोजो में अजान दी है,

हूँ कन्या पूजन जीमण या शाम की इफ्तारी,

दोनों ही सूरतों में, अहद ए शबाब हूँ मैं '


'जला हूँ बन कर रावण, कुर्बान हुआ ईदी में,

हर्ष ओ उल्लास देखा मैनें, दोनों ही तरफा है,

गूंजा जो जयकारो में, झूमा नमाज में भी,

आंठवा सरगम का शायद अब शब्द हूँ मैं'


'राम का हूँ वानर या रहीम का मैं सूफी,

धोखे के वार से हुआ, लहू लुहान हूँ मैं,

राम और रहीम में क्या फ़र्क है ये बोलो,

जबकि फकत मिट्टी का एक इंसान हूँ मैं'


'अक्स'

Sunday, March 20, 2022

होली का हुड़दंग

आया होली का हुड़दंग,

भरे हैं सबके मन में रंग

हो बोलो सारा रा रा,


आयी है रंगों की बारात, 

साथ में खुशियां लिए अपार,

हो बोलो सारा रा रा,


घोट ली सबने जमकर भंग,

उड़ाएं तरह तरह के रंग,

हो बोलो सारा रा रा,


पुते हैं सारे रंग गुलाल,

क्या जाने चेहरे और क्या बाल,

हो बोलो सारा रा रा,


जुड़े हैं लोगो के हुज़ूम,

गा रहे फगवा झूम झूम

हो बोलो सारा रा रा,


झूमे मस्ती में सब नर नार,

उड़ायें रंग-अबीर अपार

हो बोलो सारा रा रा,


बच्चों की नटखट टोली,

कर रही सबसे ही ठिठोली,

हो बोलो सारा रा रा,


गुबारे चलें गोली की चाल,

कर रहे लोगो को बेहाल,

हो बोलो सारा रा रा,


बन रहे गुंझिया और मिठाई,

झूम रही कचौरी और कढ़ाई,

हो बोलो सारा रा रा,


एक ये रंगों का त्योहार,

मिटाता आपस का सब बैर

हो बोलो सारा रा रा


'अक्स'

Friday, August 27, 2021

खलिश

"आज आईना मुझसे नाराज़ सा है,

मेरे असास की दरारें, दिखाता ही नही,

आदिल ये मेरा हमसफर, रहा है सदियों से,

इक्तिज़ा ये आब-ए-आईना की, जानता ही नही"


"वक्त मुकर्रर है मेरा, आशिक़ से मिलने का,

ख़लिश में बंधा है पाँव, आगे बढ़ता ही नही,

गंजीदा सा है मेरा अक्स, संभालूं तो कैसे,

गिला करता है, गुलिस्तां गुल खिलाता ही नही"


"गवारा होती नही अब, ये चमक चिलमन की,

चमन में मेरे चराग, अब कोई जलाता ही नही,

जुम्बिश कहूँ या चस्मक, फ़क़त नज़र का फेर है,

अब्र के फेर में अब, कोई जमजम पिलाता ही नही"


"अल्फ़ाज़ मेरे टूटे है अब, अज्ज करते करते,

खंडहर हुई इमारत मगर, कोई बसाता ही नही,

कीमत मेरे ज़मीर की, है यूं तो बस एक सच,

अफसोस दुनिया में ये बोली, कोई लगाता ही नही"


'अक्स'

Wednesday, July 7, 2021

उम्मीद

"होकर नाउम्मीद, वो यूं रोया होगा,

ख़ुश्क अश्कों में, खुद को डुबोया होगा,

तासीर उस ताबिश की, होगी जाने क्या,

इल्मे अंजाम में, ख़ुदी को गंवाया होगा"


" ख़ुत्बा करने वाले से, तौबा की होगी,

इब्तिसाम को, क़ल्बे कानून बनाया होगा,

आमद में अज़ीज़ों की, बिछाये जो अब्सार,

पर अफसोस, अन्जुमन में कोई न आया होगा"


"आब ए तल्ख, कर लिए होंगे जज्ब उसने,

जब अभी अब्ना ने उसे ठुकराया होगा,

अल्फ़ाज़ बिखर गए होंगे, यूँही टूट कर,

आदिल को जग,  जहन्नुम नज़र आया होगा"


"नाचार, नाताक़त, उसे समझा है सभी ने

 तारीक को उसने, तबस्सुम से मिटाया होगा,

नादिम रहा उम्र भर , वो नबी के ख्याल में,

नुमाइश उसे जग में, कभी करना न आया होगा"


'अक्स'

Friday, June 25, 2021

महामारी

 "कुछ की होगी खता हमने,

जो ये महामारी आयी है,

बनकर एक काल दंश जो,

पूरी मानवता पर छाई है"


"किया जंगल से खिलवाड़ कहीं,

 कहीं नदियों में आग लगाई है,

विकास की एक झूठी जिद ने,

आफत दुनिया पर ढाई है"


"चमगादड़ की लेकर आड़ कहीं,

हमने प्रकृति की हंसी उड़ाई है,

जैविक हथियार की अंधी दौड़ में,

अपनो की ही मौत बनाई है"


"कोई खून के आंसू रोता है,

कोई सब अपनो को खोता है,

सब लिए सिलेंडर भाग रहे,

साँसों की अब ये लड़ाई है"


"ना अस्पताल में बेड कहीं,

ना ही मिल रही दवाई है,

एक एक इंजेक्शन पर लड़ मरे सब,

अब यहां हर कोई आततायी है"


" निज़ाम सो रहा घोड़े बेच,

 हो रही न कोई सुनवाई है,

प्रजा का सुनकर हो हल्ला,

उसने कानो में रुई जमाई है"


"खुद ही करना, खुद ही भरना,

लोगो को सीख ये आयी है,

है राजा ना कोई, रंक यहां,

ये महामारी सबको सिखलाई है"


"करना होगा हमे गहन विचार,

क्यों ये महामारी आयी है"

'अक्स'

Monday, June 14, 2021

ख्वाहिश

 "ख़ुश्क, खस्ता हाल है आज हर ज़मीर,

ख्वाहिशों से लबालब, इंसां नज़र आता है,

खास ओ आम में फ़र्क़, अब मुमकिन ही नहीं,

ग़ुम ग़ज़िदा अब, हर बेकरार नज़र आता है"


"गुमगश्ता ज़िन्दगी है, अब इन राहों में कहीं,

गर्दिशों में फंसा, हर नादाँ नज़र आता है,

अस्हाब मान बैठे हैं खुद को, कुछ जर खरीद गुलाम,

अफ़सुर्दा अलीम भी अब, अपने इल्म को रोता है"


"इफ़्रात की बीमारी, खा जाती है फ़ज़ल को,

इनाद का एक पौधा, पनपता नज़र आता है,

इबादत की नही इबारत, इस जहां में ओर कोई,

ख़िदमत हो गर इंसां की, बस नूर बरस जाता है"


"बे ज़ार, बे कस, बे खुद ,है ये पासबान चमन का,

बेक़ल जिसकी फ़िक्र में, हर गुल नज़र आता है,

समझे है खुद को कातिब, इस बज़्म में हर कोई, 

मुग़ालते में इश्क़ के, 'अक्स' बर्बाद हुआ जाता है"

'अक्स'

Wednesday, June 9, 2021

अल्फ़ाज़

 "कुछ यूं उधड़े अल्फ़ाज़ सिल लिए मैंने,

डोर कच्ची थी मगर काम आ गयी,

ज़हमत जो उठाई , कभी कुछ कहने की,

वो तबस्सुम मेरे लफ़्ज़ों पे छा गयी"


"तर्जुमान को भी खोजा, कहीं मिल जाये,

सुर्ख लबों की ये चुन्नटें अब खुल जाएं,

तसल्ली न मिली, तारिक मिलता गया,

तिशनगी उस नाआशना की, जेहन पे छा गयी"


"दानिश भी परेशां हैं, मेरे हाल को लेकर,

फ़ितरत मेरे मर्ज़ की , कुछ यूं गुमा गयी,

रोग है फुराक़ का या फ़ुवाद का ए 'अक्स',

इब्तिला थी मेरी, पर सबको रुला गयी"

'अक्स'