"ज़िंदगी के रंग भी कितने अज़ीब होते हैं,
अपने दूर रहकर भी करीब होते हैं,
उड़ा ले जाती है आँधी बड़े बड़े दरखतो को,
ठहर वो ही पाते हैं जो ज़मीन के करीब होते हैं"
"यूँ तो वार करते रहने से पत्थर भी टूट जाते हैं,
सहन करने का हुनर तो बस इंसान को ही आता है,
अरे सीखना है कुछ तो उन दरखतो से सीखो,
जो अपने कलेजे के टुकड़े भी तुम पर वार जाते हैं"
"खुशी तो कभी गम के रंग देख कर रोते क्यूँ हो,
ज़िंदगी में दिन ऑर रात भी इनके निशान होते हैं.,
मुक़र्रर वक़्त पे मुक़द्दर तेरा चमकेगा अक्स,
हौसलें रखने वालो के ही सपनो के मुकाम होते हैं"
"अक्स"
Wednesday, July 6, 2011
Wednesday, June 1, 2011
ललक
"काश स्वछंद लहरों सी, हो पाती ये जिंदगी,
फिर हर डगर में ही, बह जाती ये जिंदगी,
कभी न किसी का कोई विराम रह जाता,
हर ठहराव को तोड़,आगे बढ़ जाती ये जिंदगी"
"करती अठखेलियाँ पल पल,बहती हवा के झोकों से,
एक चंचल नवयोवना सी, इठलाती ये जिंदगी,
बलखाती यूँ मानो,लचकी हो कमर कोई,
यूँ ही किसी इशारे से, मन बहकाती ये जिंदगी"
ज़माने की कोई परवाह, न चिंता दुनियादारी की,
यूँ ही बस होंसलों को परवाज़, दे जाती ये जिंदगी,
हो दुनिया में ग़म कितना, तपिश चाहे ज़माने में,
तन और मन को यूँ ही शीतल कर जाती ये जिंदगी"
"अक्स"
फिर हर डगर में ही, बह जाती ये जिंदगी,
कभी न किसी का कोई विराम रह जाता,
हर ठहराव को तोड़,आगे बढ़ जाती ये जिंदगी"
"करती अठखेलियाँ पल पल,बहती हवा के झोकों से,
एक चंचल नवयोवना सी, इठलाती ये जिंदगी,
बलखाती यूँ मानो,लचकी हो कमर कोई,
यूँ ही किसी इशारे से, मन बहकाती ये जिंदगी"
ज़माने की कोई परवाह, न चिंता दुनियादारी की,
यूँ ही बस होंसलों को परवाज़, दे जाती ये जिंदगी,
हो दुनिया में ग़म कितना, तपिश चाहे ज़माने में,
तन और मन को यूँ ही शीतल कर जाती ये जिंदगी"
"अक्स"
Monday, May 9, 2011
ज़िंदगी का सच
“ज़िंदगी गम के क्षणो में मुस्कुरा देती है,
दर्द कितना भी गहरा हो, भुला देती है,
हर एक लम्हा अनमोल है ज़िंदगी का,
किसी को मिटा देती,किसी को बना देती है”
“ख्वाब है या हक़ीक़त है ज़िंदगी,
गरचे दोनो का ही मज़ा देती है,
लुत्फ़ हर उम्र में इसका उठाया जाए,
ये बूढ़ो को भी जवान बना देती है”
“जाँचने निकल पड़ा हूँ ज़िंदगी के हर्फ,
पर ये गुत्थी तो उलझती ही जाती है,
इस करवट कभी उस करवट बिठलाती अक्स,
रोज़ नये नये तमाशे ये दुनिया को दिखलाती है”
“अक्स”
दर्द कितना भी गहरा हो, भुला देती है,
हर एक लम्हा अनमोल है ज़िंदगी का,
किसी को मिटा देती,किसी को बना देती है”
“ख्वाब है या हक़ीक़त है ज़िंदगी,
गरचे दोनो का ही मज़ा देती है,
लुत्फ़ हर उम्र में इसका उठाया जाए,
ये बूढ़ो को भी जवान बना देती है”
“जाँचने निकल पड़ा हूँ ज़िंदगी के हर्फ,
पर ये गुत्थी तो उलझती ही जाती है,
इस करवट कभी उस करवट बिठलाती अक्स,
रोज़ नये नये तमाशे ये दुनिया को दिखलाती है”
“अक्स”
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ज़िंदगी का सच
Wednesday, April 20, 2011
तरन्नुम-ए-इश्क
"वादी-ए-इश्क में गूंजते थे मेरे नगमे जहाँ,
आज फुरकत-ए-मौशिकी का आलम फैला है,
वो एक दिल जो कभी धड़कता था मेरे लिए,
क्यूँ आज उसमे एक आंसुओं का रेला है"
"तैरती थी जिन आँखों में कभी मोहब्बत मेरी,
क्यूँ बस आज उन पलकों पर पानी फैला है,
मेरा नाम लेकर लरजते थे कभी जो दो लब,
आज उन पर क्यूँ एक गुमनामी का मेला है"
"कुसूर तेरा न मेरा, न किसी का है अक्स,
आज आबो हवा में मोहब्बत का रंग ही मैला है,
टूट कर बिखरने न दूंगा कभी प्यार के धागे,
मेरा प्यार आखिरी तू ही और तू ही पहला है "
"अक्स"
आज फुरकत-ए-मौशिकी का आलम फैला है,
वो एक दिल जो कभी धड़कता था मेरे लिए,
क्यूँ आज उसमे एक आंसुओं का रेला है"
"तैरती थी जिन आँखों में कभी मोहब्बत मेरी,
क्यूँ बस आज उन पलकों पर पानी फैला है,
मेरा नाम लेकर लरजते थे कभी जो दो लब,
आज उन पर क्यूँ एक गुमनामी का मेला है"
"कुसूर तेरा न मेरा, न किसी का है अक्स,
आज आबो हवा में मोहब्बत का रंग ही मैला है,
टूट कर बिखरने न दूंगा कभी प्यार के धागे,
मेरा प्यार आखिरी तू ही और तू ही पहला है "
"अक्स"
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तरन्नुम-ए-इश्क
Friday, March 4, 2011
पाबंदी
"दिल मचलता है उनकी याद में ज्यों उफनता दरिया,
याद आती है हमे,रह रह कर तड़पाती है,
आँगन की मिट्टी ने डाल रखी हैं बेड़ियाँ पाँव में,
तोड़ने में जिनको घर की चौखट भी उखड़ जाती है"
"बेबस इधर मेरा दिल भी है, उधर मेरा हबीब भी,
दिन कटता दुहाई में, रात कशमकश में गुज़र जाती है,
वक़्त का दरिया बह रहा हम दो किनारो के बीच,
बहाव में जिसके कोई किश्ती ना ठहर पाती है"
"उदास आँखो से झरते आँसू झर झर,
बरसात भी जिनके आगे फीकी पड़ जाती है,
दहलीज़ लाँघने की कुव्वत उसमे है ना मुझमे,
हमारी मुहब्बत बस यूँ ही दम तोड़ती रह जाती है"
"अक्स"
याद आती है हमे,रह रह कर तड़पाती है,
आँगन की मिट्टी ने डाल रखी हैं बेड़ियाँ पाँव में,
तोड़ने में जिनको घर की चौखट भी उखड़ जाती है"
"बेबस इधर मेरा दिल भी है, उधर मेरा हबीब भी,
दिन कटता दुहाई में, रात कशमकश में गुज़र जाती है,
वक़्त का दरिया बह रहा हम दो किनारो के बीच,
बहाव में जिसके कोई किश्ती ना ठहर पाती है"
"उदास आँखो से झरते आँसू झर झर,
बरसात भी जिनके आगे फीकी पड़ जाती है,
दहलीज़ लाँघने की कुव्वत उसमे है ना मुझमे,
हमारी मुहब्बत बस यूँ ही दम तोड़ती रह जाती है"
"अक्स"
Friday, February 25, 2011
मुकाम
"इजहार-ए-मोहब्बत जो अब हमने किया बशर,
बात निकली भी न थी कि लब थरथरा उठे,
हया की वो लाली उभर आई उन आँखों में,
जिसे देख ले जो एक बार मुर्दा भी जी उठे"
"हम हो गए कुर्बान उस हसीन चेहरे पर,
दिल अपना बस एक पल में हम गवां बैठे,
वो मुस्काई परेशान देख कर मुझको,
हमारे दिल में ख्वाबो के आफ़ताब जल उठे"
"तमन्ना है अब उसको हम-आगोश मैं कर लूँ,
बुझा लूं प्यास नजरो की न फिर ओर जल उठे,
तकाजा जिंदगी का है और खतरा मौत का अक्स,
इधर उसकी उठी डोली, उधर मेरा जनाज़ा उठे"
"अक्स"
बात निकली भी न थी कि लब थरथरा उठे,
हया की वो लाली उभर आई उन आँखों में,
जिसे देख ले जो एक बार मुर्दा भी जी उठे"
"हम हो गए कुर्बान उस हसीन चेहरे पर,
दिल अपना बस एक पल में हम गवां बैठे,
वो मुस्काई परेशान देख कर मुझको,
हमारे दिल में ख्वाबो के आफ़ताब जल उठे"
"तमन्ना है अब उसको हम-आगोश मैं कर लूँ,
बुझा लूं प्यास नजरो की न फिर ओर जल उठे,
तकाजा जिंदगी का है और खतरा मौत का अक्स,
इधर उसकी उठी डोली, उधर मेरा जनाज़ा उठे"
"अक्स"
Tuesday, February 22, 2011
एक ख्वाहिश
"जिंदगी तुझे गले लगाने की जुस्तजू है,
बीते लम्हे फिर से पाने की आरज़ू है,
हम-आगोश था मैं अभी तक अपने हबीब से,
अब सबके लिए कुछ कर जाने की जुस्तजू है"
"शाम-ए-खुर्शीद बह रही हवा के झोंके मानिंद,
मेरी रेत को हथेली में थामने की आरज़ू है,
सुबह की उफ़क बन गयी शफ़क मेरी,
हर दीद-ए-तहर को महर बनाने की जुस्तजू है"
"उखुव्वत हर बशर कर ले इस मकां में,
मौशिकी-ए-उल्फत का पयाम हो हर लब पर,
खाबिदा आलम न मुज़तर हो सुन मेरी ग़ज़ल,
हर दर पे एक फ़िरदौस बसाने की जुस्तजू है"
"अक्स"
बीते लम्हे फिर से पाने की आरज़ू है,
हम-आगोश था मैं अभी तक अपने हबीब से,
अब सबके लिए कुछ कर जाने की जुस्तजू है"
"शाम-ए-खुर्शीद बह रही हवा के झोंके मानिंद,
मेरी रेत को हथेली में थामने की आरज़ू है,
सुबह की उफ़क बन गयी शफ़क मेरी,
हर दीद-ए-तहर को महर बनाने की जुस्तजू है"
"उखुव्वत हर बशर कर ले इस मकां में,
मौशिकी-ए-उल्फत का पयाम हो हर लब पर,
खाबिदा आलम न मुज़तर हो सुन मेरी ग़ज़ल,
हर दर पे एक फ़िरदौस बसाने की जुस्तजू है"
"अक्स"
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