Wednesday, November 5, 2008

वो अकेली लड़की

"देखी मैंने एक दिन एक लड़की
थी थोडी घबराई थोडी झेंपी सी
जाने किसका था इंतज़ार उसको
देखती थी वो बार बार घड़ी"

"देखा गौर से तो लगी थोडी परेशान सी
उसे न था किसी से मतलब कोई
सड़क भी थी लगी होने सुनसान सी"

"धीरे धीरे समय बीतता रहा
वो खड़ी रही सबसे अनजान सी
अंत में बस हम दोनों थे खड़े वहाँ
लगा वो होने लगी गुमनाम सी"

"वो चलने लगी सड़क के एक ओर को
अंधेरे की ओढ़कर चादर वीरान सी
मैं रहा देखता उसे बस रहा सोचता
वो कौन थी अकेली लड़की
वो कौन थी अकेली लड़की "

"अक्स"

3 comments:

Akshaya-mann said...

"wo akeli ladki"
kya bhai ye sach mai hua tha???:)
apne ehsaason ko acche se vyakt kiya hai bahut sundar........:)akshay-mann

kavitaprayas said...

bahut sundar !

dr.bhoopendra singh said...

khyal ek dam shayarana hai bandhu,sirf itna kahna hai ki aap ek din bahut accha likne wale ho. meri haardik shubhkamnayen
dr.bhoopendra rewa m.p