Tuesday, July 20, 2010

चितचोर

"वो बहकी सी मदहोश निगाहें,
मानो मय का सागर छलका रही हैं,
हर कोई पागल हो चल पड़ा उनके पीछे,
वो फिर भी अपना जाल फैला रही है"

"भरी हिरनी सी चंचल चपलता उनमे,
सूरज सा चमक एक तेज बिखेर रही हैं,
पलकों की ओट से शीतल चाँदनी फैलातीं वो ,
जाने किस गुमान में उड़ी जा रही हैं"

"जग में फैला रहीं एक भ्रम जाल वो,
मस्ती में बस झूम रही हैं,
बन तेज़ कटारी उतर पड़ी हर दिल में,
जग के सब बंधन काट रही हैं"

"अक्स"

Sunday, July 11, 2010

हया

"उनकी पलकों पर फैली वो मद्धम सी हया,
जाने क्यूँ मेरे दिल में उतर जाती है,
उनकी निगाहों में उभरती हुई एक लकीर,
मानो मेरे होने पर ही एक सवाल उठाती है"

"वो मुस्कुराती है होले से कुछ इस तरह,
जैसे रात में तारो संग चांदनी फ़ैल जाती है,
लब थिरकते रहते हैं पर न कुछ बोलती वो,
बिन कुछ कहे भी जाने कैसे सब कह जाती है"

"तडपाती है मुझे जाने क्यूँ उन अदाओ से,
फिर एक तिरछी नज़र से घायल कर जाती है,
बड़ी अजीब है ये उसकी क़त्ल करने की अदा अक्स,
जिसको वो अपनी हया के पहलू में छुपा जाती है"

"अक्स"

Tuesday, June 29, 2010

सहर

"उन आँखों में फैली एक गहरी उदासी,
आज उस घनी झील में एक तूफ़ान सा है,
जिनमे बहते थे हम कभी मस्ती से भरे,
उन्ही लहरों पे फैला आज कोई जाल सा है"

"कभी मस्ती छलकाते वो दो रस के प्याले,
मय के लिए जिनकी आज रिंद तरसता सा है,
क्यूँ गुम गए हैं यूँ ही एक स्याह अँधेरे में,
सागर में जिनकी बेबसी के सूरज भी जुगनू सा है"

"खेला करते थे जहाँ सपने उस एक जहाँ में,
वो आज गम के अंधेरो से वीरान सा है,
तमन्ना है अक्स मेरी अंतिम फिर वहां सहर की,
पर मेरा निगेहबान तो मुझसे भी रूठा सा है"

Friday, May 28, 2010

खोखला समाज

"आज फिर यूँ ही घर से निकलते ही,
वो फिर सामने आ खड़ी हुई,
उलझे बाल, रूखा चेहरा लिए,
मानो किसी ने उसका खून चूस लिया हो"

"हाँ यही तो हुआ था शायद उसके साथ,
पहले घर की चारदीवारी,फिर संतानो ने चूसा,
बाकी बचा हुआ समाज की खोखली कुरीतियों ने ,
छोड़ा तो बस हाड़ माँस का एक गलता हुआ शरीर"

"उसे देख जाने मुझे ऐसा क्यूँ लगता है,
वो इस खोखले समाज की ज़िंदा तस्वीर है,
धीरे धीरे समाज भी गल रहा उसके साथ अब,
ओर वो बेबस पड़ी पड़ी सिसक रही है"

"अक्स"

Thursday, May 13, 2010

ज्वाला

"आज अनायास ही मस्तिष्क में उभर आए कुछ पल,
गूलर व्रक्ष पर खिले उस सलोने पुष्प की तरह,
जज़्ब थी कहीं कहीं शीत ऋतु की ज्वाला उनमे,
तो कहीं दमके सुलगते हुए अँगारे की तरह"

"बहने लग पड़े मानसिक पटल पर कुछ यूँ,
पर्दे पर अभिनीत किसी चलचित्र की तरह,
देख जिसे उभरी महीन रेखाएँ किसी ललाट पर,
किसी ह्रदय में उभरे एक बवंडर की तरह"

"जाने क्यूँ आंकलन करने लग पड़ा मैं उनका,
बैठ किसी बही में एक मुंशी की तरह,
जोड़ने लग पड़ा कि ऩफा ओ नुकसान देखूं,
अटका जो एक बार तो इसी में रह गया बिंदु की तरह"

"अक्स"

Monday, April 26, 2010

अंत

"जीवन के अंतिम पथ पर मैं बस कदम बढ़ने वाला हूँ,
बुझा दिए जो तूफान ने वो दीप जलाने वाला हूँ,
डूबता सूरज जलता है अपने ही ढलने के गम में,
आगे बढ़कर अब उसको मैं बस थामने वाला हूँ"

"लुटा दी मैने ज़िंदगी यूँ ही बस ऑरो के लिए,
अब जाके अपना ख़याल क्यूँ आया है,
करूँ भी तो क्या करूँ है यही कशमकश,
अब जब सब कुछ छोड़ के जाने वाला हूँ"

"आखरी नमाज़ भी कर लूँ अता मैं अब,
जब खुद खाक में मिलने वाला हूँ,
साकी पिलाएगी मुझे क्या अब जाम-ए-हुश्न ए अक्स
बस कुछ ही पल में मैं इस मय में मिलने वाला हूँ"

"अक्स"

Sunday, April 25, 2010

गुबार

"मिलकर तुमसे लगा यूँ जैसे जन्नत मिल गयी,
हम तो कब से बर्बाद ए मुहब्बत हुआ करते थे,
तेरी हँसी ने दी मेरे दिल को वो राहत,
तलाश में जिसकी हम राहों में फिरा करते थे"

"एक दर्द का दरिया बहता था कभी सीने में हमारे,
जिस से मेरी रूह पे भी फफोले हुआ करते थे,
तेरी पर्छाईं की छाया से हुआ कुछ यूँ असर,
वो हो गये शबनम जो कभी शोला हुआ करते थे"

"गैरों से क्यूँ हो शिकवा हमे अपनो ने किया कत्ल,
आश्तीनों में जिनकी छुपे खंजर हुआ करते थे,
दिन ये भी वो ही हैं, दिन वो भी वो ही थे,
हम हैं तन्हा अब भी तब भी हुआ करते थे"

"अक्स"