"जीवन की इस आपा धापी में
मेरा बचपन कहीं खो गया है
ना जाने क्या क्या सॅंजो रखा था मैने
जो मेरा होकर भी कहीं छुट गया है"
"वो बचपन की बातें, वो सारी बरसातें
वो यारो का मिलना , मिलकर झगड़ना
वो गाँव की गलियाँ, गाँव के मेले
ना जाने कहाँ हैं उन्हे ढूंढता हूँ"
"वो बापू की डाटें, वो माँ का दुलार
भाई का स्नेह, बहन की राखी का प्यार
जीवन का मेरे जो था एक सहारा
ना जाने क्यूँ मुझसे छीना गया है"
"नहीं बचा कुछ भी अब इस जीवन में
जो लगे मुझे अपना, जो लगे प्यारा सा
फिर ढूंढता हूँ वही अपना बचपन
लुटा के अपना ये मैं जीवन सारा"
"अक्स"
Wednesday, November 26, 2008
Wednesday, November 12, 2008
बरसात की रात
"बात है एक रात की
हो रही बरसात थी
जा रहा था मैं भीगते -२
संग किसी की याद थी"
"भीगते-२ पहुँचा मैं किसी मोड पर
नहीं आ रहा था नज़र कोई रोड पर
मुझे लगा मैं खो गया हूँ
चल रहे हैं कदम, मैं सो गया हूँ"
"तभी दी किसी ने आवाज मुझे
कहाँ जा रहा है यूँ भीगते हुए
देखा चौंककर, नहीं आया कोई नज़र
अब तो लगने लगा मुझे अंधेरे से डर"
" तभी आया ये ख्याल मुझे कि
थी आवाज ये मेरे मन की
जिसमें भरी है उमंग मेरे जीवन की
यही सोचते-२ मैं रात भर चलता रहा
कि बरसात कि रात में क्या रात भर मैं करता रहा
बरसात कि रात में क्या रात भर मैं करता रहा
"अक्स"
हो रही बरसात थी
जा रहा था मैं भीगते -२
संग किसी की याद थी"
"भीगते-२ पहुँचा मैं किसी मोड पर
नहीं आ रहा था नज़र कोई रोड पर
मुझे लगा मैं खो गया हूँ
चल रहे हैं कदम, मैं सो गया हूँ"
"तभी दी किसी ने आवाज मुझे
कहाँ जा रहा है यूँ भीगते हुए
देखा चौंककर, नहीं आया कोई नज़र
अब तो लगने लगा मुझे अंधेरे से डर"
" तभी आया ये ख्याल मुझे कि
थी आवाज ये मेरे मन की
जिसमें भरी है उमंग मेरे जीवन की
यही सोचते-२ मैं रात भर चलता रहा
कि बरसात कि रात में क्या रात भर मैं करता रहा
बरसात कि रात में क्या रात भर मैं करता रहा
"अक्स"
पतझड़
"आज फिर पतझड़ का मौसम आया है
बनकर बेकरारी सबके दिलों पर छाया है
बेकरार-ओ-बेबस हैं सब इस पतझड़ में
इसने सभी का चैन चुराया है
आज फिर पतझड़ का मौसम आया है"
"पतझड़ में पत्ते साख से बिछड़ जाते हैं
अजनबी की तरह न कभी वापस आते हैं
कहाँ जाते हैं नहीं जानता कोई
बस दिलों में अपनी यादें छोड़ जाते हैं"
"कहते हैं लोग पतझड़ बीत जाएगा
कभी न कभी बसंत भी आएगा
पर जो बिछड़ गए हैं इस पतझड़ में हमसे
कोई बताये उन्हें कौन वापस लायेगा"
"इस दिल से निकलती है दुआ ऐ-रब
ऐसा पतझड़ न किसी के जीवन में आए
न बिछ्ड़ें उससे कभी उसके अपने
वो न एक साख से टूट पत्ता बन जाए"
"अक्स"
बनकर बेकरारी सबके दिलों पर छाया है
बेकरार-ओ-बेबस हैं सब इस पतझड़ में
इसने सभी का चैन चुराया है
आज फिर पतझड़ का मौसम आया है"
"पतझड़ में पत्ते साख से बिछड़ जाते हैं
अजनबी की तरह न कभी वापस आते हैं
कहाँ जाते हैं नहीं जानता कोई
बस दिलों में अपनी यादें छोड़ जाते हैं"
"कहते हैं लोग पतझड़ बीत जाएगा
कभी न कभी बसंत भी आएगा
पर जो बिछड़ गए हैं इस पतझड़ में हमसे
कोई बताये उन्हें कौन वापस लायेगा"
"इस दिल से निकलती है दुआ ऐ-रब
ऐसा पतझड़ न किसी के जीवन में आए
न बिछ्ड़ें उससे कभी उसके अपने
वो न एक साख से टूट पत्ता बन जाए"
"अक्स"
नन्ही खुशी " मेरी प्यारी-२ भतीजी इतिश्का"
"आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है
बनकर मुस्कान सबके लबो पर छाई है
देखते हैं सब प्यार से बार बार उसे
जो बनकर हमारे लिए एक तोहफा आई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"बसी है उसी में जान हम सबकी
लगती है वो एक नन्ही परी सी
देखता है उसे कोई जब भी , कहीं भी
कहता है हमने कुदरत की मेहरबानी पाई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"मैं उसे देख कर फूला नहीं समता हूँ
सारे जहाँ की खुशियाँ संग उसी के पाता हूँ
बनकर एक आफ़ताब उसने रौशनी फैलाई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"अक्स"
बनकर मुस्कान सबके लबो पर छाई है
देखते हैं सब प्यार से बार बार उसे
जो बनकर हमारे लिए एक तोहफा आई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"बसी है उसी में जान हम सबकी
लगती है वो एक नन्ही परी सी
देखता है उसे कोई जब भी , कहीं भी
कहता है हमने कुदरत की मेहरबानी पाई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"मैं उसे देख कर फूला नहीं समता हूँ
सारे जहाँ की खुशियाँ संग उसी के पाता हूँ
बनकर एक आफ़ताब उसने रौशनी फैलाई है
आज हमारे घर एक नन्ही खुशी आई है"
"अक्स"
Monday, November 10, 2008
वो
"दर्दे दिल बयान करूँ भी तो कैसे
यहाँ दिल की सदा कोई सुनता नहीं
दामन में मेरे ही बस उलझे हैं काँटे
कोई उनको यहाँ क्यूँ चुनता नहीं"
"वो जो अगर आज हमारी होती,
आरजू मेरी ना यूँ कुँवारी होती,
दिल की खलवतो में बसती वो,
मेरी दुनिया में ना वीरानी होती "
"जिंदगी में कुछ मुकाम ऐसे भी आते हैं
जब नहीं मिलती राही को मंजिल उसकी
भटकता रहता है वो दर बदर साहिल
उसके अपने भी साथ छोड़ जाते हैं"
"जला कर घर मेरा उन्हें क्या मिला साहिल
हमसे कहते तो हम उनका दर्द भी अपना लेते !"
" कुछ यों मौसम- ए- हाल बना रक्खा है मैने
दिल में तेरी जुदाई का गम पाल रक्खा है मैने
ना जाने तू क्यूँ नाखुदा हो गया साहिल
फिर भी तुझी को खुदा मान रक्खा है मैने"
"अक्स"
यहाँ दिल की सदा कोई सुनता नहीं
दामन में मेरे ही बस उलझे हैं काँटे
कोई उनको यहाँ क्यूँ चुनता नहीं"
"वो जो अगर आज हमारी होती,
आरजू मेरी ना यूँ कुँवारी होती,
दिल की खलवतो में बसती वो,
मेरी दुनिया में ना वीरानी होती "
"जिंदगी में कुछ मुकाम ऐसे भी आते हैं
जब नहीं मिलती राही को मंजिल उसकी
भटकता रहता है वो दर बदर साहिल
उसके अपने भी साथ छोड़ जाते हैं"
"जला कर घर मेरा उन्हें क्या मिला साहिल
हमसे कहते तो हम उनका दर्द भी अपना लेते !"
"
"अक्स"
Wednesday, November 5, 2008
वो अकेली लड़की
"देखी मैंने एक दिन एक लड़की
थी थोडी घबराई थोडी झेंपी सी
जाने किसका था इंतज़ार उसको
देखती थी वो बार बार घड़ी"
"देखा गौर से तो लगी थोडी परेशान सी
उसे न था किसी से मतलब कोई
सड़क भी थी लगी होने सुनसान सी"
"धीरे धीरे समय बीतता रहा
वो खड़ी रही सबसे अनजान सी
अंत में बस हम दोनों थे खड़े वहाँ
लगा वो होने लगी गुमनाम सी"
"वो चलने लगी सड़क के एक ओर को
अंधेरे की ओढ़कर चादर वीरान सी
मैं रहा देखता उसे बस रहा सोचता
वो कौन थी अकेली लड़की
वो कौन थी अकेली लड़की "
"अक्स"
थी थोडी घबराई थोडी झेंपी सी
जाने किसका था इंतज़ार उसको
देखती थी वो बार बार घड़ी"
"देखा गौर से तो लगी थोडी परेशान सी
उसे न था किसी से मतलब कोई
सड़क भी थी लगी होने सुनसान सी"
"धीरे धीरे समय बीतता रहा
वो खड़ी रही सबसे अनजान सी
अंत में बस हम दोनों थे खड़े वहाँ
लगा वो होने लगी गुमनाम सी"
"वो चलने लगी सड़क के एक ओर को
अंधेरे की ओढ़कर चादर वीरान सी
मैं रहा देखता उसे बस रहा सोचता
वो कौन थी अकेली लड़की
वो कौन थी अकेली लड़की "
"अक्स"
सफर
"निकला हूँ एक अनजाने सफर पर
न मालूम जाना कहाँ, जाना किधर,
बस चला हूँ नापते हुए डगर
मन में है शंका फिर भी मगर
की क्या है ये ज़िंदगी का सफर"
"जिसे करते हैं लोग पर हैं बेखबर
इतने बेखबर कभी न जान पाये
कब मौत ने लिया आकर उनको धर
मैं सोचने को हूँ मजबूर साहिल
कैसा सफर है ये ज़िंदगी का सफर"
"जहाँ पल में लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं
यादें बनकर कर जाते हैं दिल में घर
ये कैसा सफर,न मालूम जाना कहाँ जाना किधर
लगता है नहीं कोई सरहद-ऐ-सफर
फिर भी चला जा रहा हूँ अनजानी डगर"
"न जाने साहिल कहाँ जाए ये डगर
फिर भी चल रहा है सफर
मन में है बस यही बात मगर
ज़िंदगी का सफर , ये कैसा सफर"
"अक्स"
न मालूम जाना कहाँ, जाना किधर,
बस चला हूँ नापते हुए डगर
मन में है शंका फिर भी मगर
की क्या है ये ज़िंदगी का सफर"
"जिसे करते हैं लोग पर हैं बेखबर
इतने बेखबर कभी न जान पाये
कब मौत ने लिया आकर उनको धर
मैं सोचने को हूँ मजबूर साहिल
कैसा सफर है ये ज़िंदगी का सफर"
"जहाँ पल में लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं
यादें बनकर कर जाते हैं दिल में घर
ये कैसा सफर,न मालूम जाना कहाँ जाना किधर
लगता है नहीं कोई सरहद-ऐ-सफर
फिर भी चला जा रहा हूँ अनजानी डगर"
"न जाने साहिल कहाँ जाए ये डगर
फिर भी चल रहा है सफर
मन में है बस यही बात मगर
ज़िंदगी का सफर , ये कैसा सफर"
"अक्स"
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