Tuesday, November 4, 2008

कौन ?

"सोचता हूँ मैं कभी-कभी
वो कौन है, और क्या है
जो छुप छुप कर आता है
सबको दिन रात तड़पाता है"

"जीवन में हंसाता है, रुलाता है
जीवन का हिस्सा बन जाता है
फिर भी नहीं कोई पहचान पाता है
कौन है वो और क्या है"

"जो हमारे मन को बहलाता है
जाएँ कभी हम जीवन में फिसल
हाथ बढाकर हमें उठाता है
कभी गम, कभी खुशियाँ दे जाता है
वो कौन है, क्या है कोई नहीं जान पाता है"

"अक्स"

मौत

"इस जिन्दगी का क्या भरोसा
क्या करिए इसका ऐतबार
है ये एक बेवफा प्रेमिका
जो लूट ले जाए करार"

"मौत है सच्ची दोस्त अपनी
अपने साथ ले कर जाती है
ये न कभी जिंदगी की तरह
पल-पल हमें तडपाती है "

"हम खाए बैठे हैं जिंदगी से खार यारो
ये जिंदगी न अब हमें भाती है
अब तो बस इंतज़ार है हमें मौत का
जाने कब गले मिलने आती है "

"अक्स"

कागज़ की किश्ती

"कागज़ की किश्ती है जीवन ये मेरा
बारिश का पानी है इसका अँधेरा
उतरती है, डूबती है ये किश्ती मेरी
ढूँढने पर भी नहीं मिलता किनारा
कब उतरेगी जाने ये किश्ती मेरी
है मुझे तूफ़ान का भय सारा
कागज़ की किश्ती है जीवन ये मेरा
बारिश का पानी है इसका अँधेरा"

"जाती हैं जहाँ तक नज़रें ये मेरी
आता है नज़र बस अश्को का मेला
नहीं रोक सकता मैं अश्क किसी के
मुझको भी है इन अश्को ने घेरा
किश्ती मेरी लहराती है इन पर
नहीं इसमें कोई दोष ऐ मांझी तेरा
कागज़ की किश्ती है जीवन ये मेरा
बारिश का पानी है इसका अँधेरा"

"अक्स"

चिराग

"जीवन मेरा एक जलता चिराग है
दामन में जिसके केवल आग है
रोशन है जहाँ सभी का इससे
सभी केवल इसके कर्ज़दार हैं
जलने की नहीं ख्वाहिश इसकी
फिर भी जलने को बेकरार है
जीवन मेरा एक जलता चिराग है
दामन में जिसके केवल आग है"

"पहलू में इसके नहीं कोई आता
जलने का डर है सबको सताता
दूर से लेते हैं सभी तपिश इसकी
नहीं गले से इसे कोई लगाता
फिर भी जलना इसका काम है
जीवन मेरा एक जलता चिराग है
दामन में जिसके केवल आग है"

"अक्स"

Sunday, November 2, 2008

करुण

एक दिन चला मैं किसी डगर पर
रुके पग मेरे सुनकर कुछ करूँ स्वर
चला उधर मैं सुन ये कोलाहल
देखा किए थे शोक कुछ जन एक मृत पर
बिलख २ कर रो रही थी माता उसकी
थाम कलाई बहन पड़ी थी बेसुध उसकी
नहीं थम रहे थे आंसू उसके तात के
बिछ्ङ गया हो जैसे कोई पात डाल से
नाम ले ले कर पुकार रहे थे भाई उसके
कर रहे करुण पुकार पितामह भी उसके
दो पग चलने पर ही डोला था उनका तन
देख जनों का हाल सिहर गया मेरा मन
लेके चले जब चार जन उस मृत को
पुकार उठी माँ "मत ले जाओ लाल मेरे को"
सोया है गहरी नींद में अभी जाग उठेगा
उठकर सबसे पहले मेरे गले लगेगा
पुकारती रह गई यही बस माता उसकी
चला गया वो बस बन गया मिटटी

"अक्स"

Saturday, November 1, 2008

उलझनें

" जीवन की ये उलझनें है कैसी
न जिसे मैं सुलझा पाता हूँ
कोशिश में इसे सुलझाने की
मैं ख़ुद ही उलझ जाता हूँ
जीवन की ये उलझनें है कैसी
न जिसे मैं सुलझा पाता हूँ"

"फंसकर रह गया हूँ मैं इनमें
न कभी इनसे निकल पाता हूँ
चाहता हूँ मैं बचना इनसे
सामने इनके मैं असहाय हो जाता हूँ
जीवन की इन उलझनों की खातिर
मैं ख़ुद को मिटाने पर आमादा हूँ"

"बनकर रह गया हूँ मैं कैदी इनका
न इनसे कभी मैं बच पाता हूँ
जीवन के हर मोड़ पर साहिल
इन उलझनों को खड़ा पाता हूँ
जीवन की ये उलझनें है कैसी
न जिसे मैं सुलझा पाता हूँ"


"अक्स"

प्यार की मंजिल

"कहता है ये दिल बार-बार
बस एक बार हो उसका दीदार
वही है अब बस मंजिल मेरी
वही है मेरे जीवन का उपहार"

" है वो एक चाँद का टुकडा
नहीं मगर जिसमें कोई दाग
चाहता हूँ मैं पाना उसको
मगर नहीं दुनिया को स्वीकार"

"चाहता हूँ देना खुशियाँ उसको
सहकर ख़ुद मैं कष्ट हजार
जीवन है वो बन गई मेरा
वही है मेरे दिल का करार"

"उसका प्यार है मंजिल मेरी
चाहता हूँ उसे पाना बार-बार
कहता है अब हार पल यही दिल
बस एक बार हो उसका दीदार
बस एक बार हो उसका दीदार"

"अक्स"