"जाने क्या ढूंढता हूँ ज़िंदगी की राहो में,
सब कुछ तो खो गया है मेरा यहाँ,
जलता रहा हर पल तन्हाई की आग में,
ना एक पल भी साथ मिल पाया किसी का"
"यूँ तो वादेवफा मिलते रहे हर मोड़ पर,
भरते रहे सभी दम हर पल वफ़ाई का,
चार पल भी ना साथ चल पाया कोई रहगुज़र,
ऑर हम पर लगता रहा इल्ज़ाम बेवफ़ाई का"
"बहता रहा खून ए जिगर बनकर अश्क मेरा यूँही,
जख्म गहरे हो गये दिल के मेरे इस हाल से,
भूल जा बातें सभी ऑर वायदे उस यार के,
बस हो गयी अब इंतहा ए अक्स तेरे इंतज़ार की"
"अक्स"
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Sunday, January 17, 2010
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